01/05/2026
वेनेजुएला के उदाहरण से भारत के बुद्धुओं अर्थात बुद्धिजीवियों को समझ आ जाना चाहिए कि ढाई हजार साल पहले तथागत बुद्ध ने क्यों कहा था --
"राजसैनिक को प्रवज्या नहीं देनी चाहिए।"
जब एक राजवंश इस नियम से विचलित होता उसे हटा दिया जाता और उसकी जगह तलवार चमकाता दूसरा राजवंश आ जाता।
अशोक ने एकमात्र स्वतंत्र जनपद कलिंग पर हमला किया, जीता और फिर युद्ध पर आँसू हजार बहाए लेकिन जमीन एक इंच फिर भी नहीं छोड़ी।
गुप्तों ने भारत को एक किया, अश्वमेध किया,अफगानिस्तान में सेना भेजी और फिर शांति का प्रचार किया, मंदिर स्तूप बनवाये।
हर्षवर्धन ने पहले उत्तरापथ विजय की फिर प्रयाग में सर्वस्व दान करते रहे।
फिर बीसवी शताब्दी में एक पाखंडी आदमी आया।
अपनी दयनीय काया को अपना हथियार बनाकर उसने जनता को 'अहिंसा' का ऐसा उल्टा पाठ पढ़ाया कि सेना को भंग करने तक की बातें होने लगीं और लेहरू के प्रिय जनरल बी एम कौल सेना से मकान बनवाने लगे।
लेकिन अब तो हिंदुओं को समझ आ जाना चाहिए कि दुनियाँ की हकीकत क्या है।
चाहे व्यक्ति हो या समाज या संस्कृति या राष्ट्र, जीवित वही रहता है जो शक्तिशाली होता है वरना कमजोर का तो ईराक और वेनेजुएला हो जाता है।
जिस अमेरिका को अपने यहाँ बसे आतंकवादी पन्नू की हत्या से भी एतराज है वह दूसरे देश में घुसकर वहाँ के राष्ट्रपति को बंधक बना लेता है।
अगर अमेरिका को लोकतंत्र की इतनी परवाह है तो चीन और रूस छोड़िये, उत्तर कोरिया पर हमला करके देख ले।
छोड़िये उत्तर कोरिया क्योंकि वहाँ तो परमाणु बम है इसलिए सऊदी अरब, यूएई पर ही हमला करके देख ले।
शक्ति में ही सामर्थ्य होती है चाहे वह शांति की हो या दंड की और यह मानवता के इतिहास का सबसे कड़वा सच है।
दया, करुणा, अहिंसा का अधिकार भी शक्तिवान को ही है।
इसलिए,
राष्ट्र के स्तर पर,
धर्म के स्तर पर,
व्यक्ति के स्तर पर,
शक्ति अर्जित करना प्रत्येक हिंदू का व्यक्तिगत नैतिक, धार्मिक और राष्ट्रीय कर्तव्य है वरना आपको मिटाने के लिये अमेरिका और चीन को बस चालीस करोड़ मुस्लिमों को उकसाना और हथियार देना भर है।
हमारे हर देवता और देवी का एक हाथ अभय मुद्रा में शांति प्रसारित करता है और दूसरे हाथ में थमा शस्त्र उस शांति की रक्षा करता है।
बस समस्या यह है कि हिंदुओं को न व्यक्तिगत शारीरिक शक्ति में इंट्रेस्ट है और न हिंदुत्व की शक्ति में, उसे बस अपनी 'जाति की शक्ति' बढानी है।