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*किसी व्यक्ति को रुपए या माल उधार देते समय कौन सी बातों का ध्यान रखें________* वर्तमान व्यापारिक युग में माल उधार दिया ज...
29/07/2023

*किसी व्यक्ति को रुपए या माल उधार देते समय कौन सी बातों का ध्यान रखें________*

वर्तमान व्यापारिक युग में माल उधार दिया जाना या फिर रुपए उधार दिया जाना एक आम चलन बन गया है। व्यक्ति के आम जीवन की समस्याएं भी अनेक है समय-समय पर आर्थिक समस्याएं घर कर जाती हैं जिनके परिणामस्वरूप व्यक्ति को उधार लेकर आर्थिक संकट से उभरना पड़ता है। व्यापार व्यवसाय चलाने हेतु भी उधार का सहारा लेना पड़ता है। कई मामले ऐसे मिलते हैं जहां किसी व्यक्ति द्वारा उधार माल ले लिया जाता है या उधार रुपए प्राप्त कर लिए जाते हैं पर उन्हें लौटाया नहीं जाता है और लौटाते समय उधार माल लेने वाले या फिर उधार रुपए लेने वाले देने वाले के सामने शेर बनकर सामने आते हैं और गुंडागर्दी करते हैं तथा उधार रुपए चुकाते नहीं है।
इस स्थिति में सारवान प्रश्न यह है कि ऐसे कौन से तरीके हैं जिनसे कानूनी रूप से किसी उधारी की वसूली की जा सके क्योंकि यदि किसी उधारी की वसूली बलपूर्वक की जाती है ऐसी स्थिति में उधार लेने वाला उधार तो चुकता करेगा नहीं और उल्टा मुकदमा पुलिस में एफआईआर दर्ज करवा देगा। यहां यह ध्यान देना चाहिए कि कोई भी ऐसा तरीका अख्तियार नहीं करना चाहिए जो गैरकानूनी हो। जैसे कि कुछ लोग बलपूर्वक उधार की वसूली करते हैं ऐसी बलपूर्वक उधार की वसूली करना खतरनाक हो सकता है।
*क्या है कानून*
जब भी हम कोई माल या रुपए किसी व्यक्ति को उधार देते है तब उसके लिए कानून ने हमें कुछ जिम्मेदारियां सौंपी हैं। कुछ ऐसे तरीके बताएं हैं जिन्हें पूरा किया जाना आवश्यक है। यदि उन तरीकों से किसी व्यक्ति को उधार नहीं दिया गया है तब उधार की वसूली नहीं की जा सकती है क्योंकि कानून भी कुछ जिम्मेदारियां सौंपता है उनमें उधारी की यह लेख पढ़ भी है जिससे यह साबित होता है कि किसी व्यक्ति को कोई राशि उधार दी गई है।
उधार देते समय कुछ लेख पढ़ होती है जिसे फुलफिल किया जाना आवश्यक होता है जिससे यह साबित हो जाए कि सामने वाले को कुछ राशि या माल उधार दिया गया है तथा अदालत में कठिनाई नहीं हो तथा सरलतापूर्वक उधार की वसूली की जा सके। सबसे ध्यान देने योग्य बात यह है कि कोई भी धनराशि जो *_₹10000_* से अधिक है उसे नगद के रूप में किसी को उधार नहीं दे। बैंक खाते के माध्यम से या फिर चेक के माध्यम से ही उसे उधार राशि दे।
कोई उधार माल कितने भी रुपए का दिया जा सकता है परंतु ऐसे उधार दिए जाने वाले माल का स्पष्ट बिल काटे जिसके अंदर सभी कर का समायोजन हो तथा सरकार को उचित कर दिया गया हो। कोई भी दो नंबर में किए गए सौदे की वसूली नहीं की जा सकती है क्योंकि कानून यहां पर यह कहता है कि जब कोई व्यक्ति सरकार को धोखा देकर कोई सौदा करता है तब वहां पर न्यायपालिका उसके साथ नहीं होती है क्योंकि उस व्यक्ति द्वारा सरकार को ही धोखा देकर उसके राजस्व की चोरी की गई है। *₹10000* से अधिक की कोई राशि किसी व्यक्ति को नगद नहीं उधार दी जा सकती है। एक बात और ध्यान देनी चाहिए उधारी का धंधा करने वालों को छूट नहीं है उधारी का धंधा करने के लिए मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के अंतर्गत लाइसेंस लेना होता है या फिर प्रदेशों के साहूकार अधिनियम के अंतर्गत लाइसेंस लेना होता है जहां यह स्पष्टीकरण देना होता है कि हमारे द्वारा एक वैध उधारी का धंधा किया जा रहा है जहां हम एक निश्चित ब्याज दर पर धनराशि लोगों को उधार देकर मुनाफा कमाते हैं। उधार की वसूली अमूमन व्यापार व्यवसाय या आम जन जीवन में कोई आर्थिक संकट आ जाने पर दिए जाने वाले उधार के लिए हैं।
बैंक खाते से करें लेन देन किसी भी बैंक खाते का ट्रांजैक्शन (लेन देन) किसी भी उधार दिए धन को साबित करने के लिए सबसे सार्थक साक्ष्य होता है। इससे यह साबित हो जाता है कि किसी व्यक्ति को कोई धनराशि दी गई है और उसने उस धनराशि को प्राप्त किया है तथा इस पर कोई आश्चर्य नहीं बनता है।
रसीद लिखवाना जिस व्यक्ति को उधार दिया जा रहा है चाहे ऐसा उधार माल के रूप में दिया जा रहा हो या फिर रुपए के रूप में दिया जा रहा हो उस व्यक्ति से उसी के हाथ से एक सादे कागज पर एक रसीद लिखवानी चाहिए जिसमें वे स्वीकार करें कि उसने कोई धनराशि या कोई माल किसी व्यक्ति से उधार लिया है और उसे वह किसी एक निश्चित की गई दिनांक को चुका देगा। उस रसीद के अंतर्गत उस उधार लेने वाले व्यक्ति के हस्ताक्षर भी होना चाहिए तथा कितने रुपए और कितना माल उधार दिया गया इसका विवरण भी होना चाहिए। सिक्योरिटी चेक चेक का इस्तेमाल आमतौर पर उधारी की वसूली के लिए तो नहीं होता है परंतु यदि कानूनी रूप से देखें तो इसे यहां भी इस्तेमाल किया जा सकता है परंतु इसके लिए एक प्रक्रिया है। जब भी कोई माल या रुपए किसी व्यक्ति द्वारा उधार लिए जा रहे हैं तब ऐसे व्यक्ति से उसके बैंक का एक चेक उस तारीख का ले जिस तारीख को उसने उधार का भुगतान करने का वचन किया है और ऐसे चेक को कभी भी ब्लेंक नहीं ले जो केवल हस्ताक्षर करके दे दिया जाता है अपितु ऐसे चेक को उसी व्यक्ति के हाथ से पेन के माध्यम से भरवाया जाए तथा उस पर दिनांक लिखी जाए जिस दिनांक को उसके द्वारा भुगतान किए जाने का वचन दिया गया है। इस प्रकार सिक्योरिटी के रूप में रखे गए चेक को सीधे बैंक खाते में नहीं लगाया जा सकता है क्योंकि यदि इस चेक को सीधे बैंक खाते में लगा दिया तब चेक के अनादर का मुकदमा दायर नहीं किया जा सकेगा क्योंकि यहां पर चेक देने वाला यह कह सकता है कि उसने चेक केवल एक सिक्योरिटी के माध्यम से दिया था परंतु इस चेक को लगाने के पूर्व एक लीगल नोटिस उधार लेने वाले के पते पर भेजा जाना चाहिए। जिस पर उसे यह चेतावनी दी जानी चाहिए कि उसके द्वारा उधार लिए गए माल या उधार लिए गए रुपए निश्चित दिनांक को चुकाए जाने का वचन दिया गया था और उसने उस दिनांक को रुपए नहीं चुकाए हैं इसलिए वह रुपए बैंक ट्रांजैक्शन के माध्यम से या फिर नगद लाकर दिए दे जिससे उसका उधार चुक जाए। यदि वे रुपए लाकर नहीं देता है या बैंक खाते में रुपए का ट्रांजैक्शन नहीं करता है तो उसके द्वारा सिक्योरिटी के माध्यम दिए गए चेक को बैंक में भुनने के लिए लगा दिया जाएगा फिर यदि वे चेक बाउंस होता है तो ऐसी स्थिति में उस पर निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट की धारा 138 के अंतर्गत एक परिवाद के माध्यम से एक आपराधिक कंप्लेंट की जा सकती है। जैसा की विदित है यह धारा चेक बाउंस को अपराध के रूप में प्रस्तुत करती है जहां चेक बाउंस होने पर 2 वर्ष तक के कारावास के दंड का प्रावधान किया गया है। अनुबंध (करार) उधार का अनुबंध इतना आवश्यक तो नहीं होता है क्योंकि यदि बैंक के माध्यम से ट्रांजैक्शन कर दिया जाए और एक रसीद लिखवा ली जाए तथा एक चेक लिखवा लिया जाए तब यथेष्ट लेख पढ़ हो जाती है परंतु यदि मामले को और अधिक सशक्त करना है तथा धनराशि अधिक है ऐसी स्थिति में उधार लेने वाले व्यक्ति से एक अनुबंध भी लिखवा लेना चाहिए जो कि मिनिमम ₹500 के स्टांप पर होना चाहिए तथा उसकी तस्दीक किसी नोटरी अधिवक्ता से करवाई जा सकती है। इस अनुबंध में यह उल्लेख होना चाहिए कि मेरे द्वारा लिया जा रहा उधार एक निश्चित दिनांक को चुकता कर दिया जाएगा तथा यह जो ऋण दिया गया है यह किसी व्यापारिक उद्देश्य से नहीं दिया गया है अर्थात देने वाले का उधार देने लेने का धंधा नहीं है अपितु एक सहायता स्वरूप उसने मुझे ऋण दिया है उसका भुगतान उसके द्वारा चेक के माध्यम से या नगद माध्यम से किया जा सकेगा। इस अनुबंध में इन सभी बातों का उल्लेख होना चाहिए इससे उधार देने वाले का मामला अधिक मजबूत हो जाता है तथा उधार की वसूली आसानी से की जा सकती है। यदि व्यक्ति के पास में देने के लिए चेक नहीं है तब उससे अनुबंध लिखवा लिया जाए। ऐसा अनुबंध लिखवा लेने के परिणामस्वरूप सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के आदेश 37 के अंतर्गत एक सिविल वाद प्रस्तुत कर उधार ऋण की वसूली की जा सकती है। यहां ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह सिविल वाद की प्रक्रिया एक संक्षिप्त प्रक्रिया होती है तथा इसे न्यायालय जल्द से जल्द निपटा देता है तथा उधार की वसूली संभव हो जाती है। उधार देते समय इन सभी कानूनी बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए इनके बगैर कोई भी बहुत सारे रुपए उधारी के रूप में नहीं दिए जाना चाहिए तथा बगैर चेक लिए या बगैर अनुबंध किए या बगैर रसीद लिखवाए ऐसे उधार नहीं दिया जाना चाहिए। यदि इन सभी फॉर्मेलिटी के बगैर कोई उधार दिया गया है तब उस उधार की वसूली नहीं हो सकती है और उधार के लिए किसी न्यायालय में कोई मुकदमा भी नहीं लाया जा सकता है क्योंकि रिकॉर्ड पर कोई साक्ष्य नहीं होते है।

12/03/2023
03/09/2022

उत्तर प्रदेश राजस्व संहिता २००६
***धारा 101. विनिमय ***

(1) : संहिता की धारा 77 में किसी बात के होते हुये भी, कोई भूमिधर उप जिलाधिकारी की लिखित में पूर्वानुमति से अपनी भूमि का विनिमय

(क) अन्य भूमिधर द्वारा धारित भूमि से, या

(ख) धारा 59 के अधीन किसी ग्राम पंचायत या स्थानीय प्राधिकरण को सौंपी गयी या न्यस्त समझी गयी भूमि से कर सकता है।

(2) : उप जिलाधिकारी उपधारा (1) के अधीन निम्नलिखित मामलों में अनुज्ञा से इन्कार कर देगा,

अर्थात्

(क) यदि ऐसा विनिमय जोतों की चकबन्दी या कृषि कार्य में सुविधा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक नहीं है; या

(ख) यदि विनिमय में दी गयी और प्राप्त भूमि का विहित रीति से अवधारित मूल्यांकनों के मध्य का अन्तर निम्नतर मूल्यांकन के दस प्रतिशत से अधिक हो जाता है; या

(ग) यदि विनिमय में दी गयी और प्राप्त भूमि के क्षेत्रफलों के मध्य का अन्तर निम्नतर क्षेत्रफल के

पच्चीस प्रतिशत से अधिक हो जाता है; या

(घ) उपधारा (1) के खण्ड (ख) में निर्दिष्ट भूमि के मामले में यदि वह नियोजित उपयोग के लिए आरक्षित है या ऐसी भूमि है जिसमें भूमिधरी अधिकार प्रोद्भूत नहीं होते हैं; या

(ङ) यदि भूमि एक ही तहसील के एक ही गांव या उससे लगे हुए गांव में स्थित न हो :

परन्तु यह कि राज्य सरकार, इस धारा की उपधारा (2) के खण्ड (घ) में उल्लिखित भूमि से विनिमय की अनुज्ञा विहित शर्तों पर और विहित रीति से, दे सकती है।

(3) : इस धारा में दी गयी कोई बात किसी व्यक्ति को किसी जोत में उसके अविभाजित हित को विनिमय करने हेतु सशक्त करती हुयी नहीं समझी जाएगी सिवाय वहां जहां ऐसा विनिमय दो या अधिक सह हिस्सेदारों के बीच हो ।

(4) : रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (अधिनियम संख्या 16 सन् 1908) में दी गयी कोई बात इस धारा के अनुसरण में किसी विनिमय पर लागू नहीं होगी।]

***नियम 100. भूमिधरों के मध्य विनियम के लिये आवेदन (धारा 101 )***

(1) : दो भूमिधरों के मध्य भूमि के विनियम के आवेदन में निम्न विशिष्टतायें अन्तर्विष्ट होंगी

(क) विनियम के दोनों पक्षकारों का नाम, पितृनाम तथा पता।

(ख) विनियम में दी जाने वाली एवं प्राप्त की जाने वाली भूमि का ब्यौरा (भूखण्ड संख्या, क्षेत्रफल, अवस्थिति तथा भू-राजस्व) ।

(ग) क्या प्रस्तावित विनियम जोतों की चकबन्दी अथवा खेती की सुविधा के लिये आवश्यक है?

(घ) क्या प्रस्तावित विनियम में भूमि पर अविभाजित हित सम्मिलित है?

(ङ) क्या भूमि अथवा उसका कोई भाग पट्टे पर दिया गया है अथवा विल्लंगामित है?
(च) विनिमय में दी गयी एवं प्राप्त होने वाली भूमि का मूल्यांकन और ऐसे मूल्यांकन में अन्तर की मात्रा।

(छ) विनियम में दी गयी एवं प्राप्त होने वाली भूमि का क्षेत्रफल एवं ऐसे क्षेत्रफल में अन्तर की मात्रा।

(ज) क्या विनियम की गयी एवं प्राप्त भूमि उसी अथवा उसी तहसील के संलग्न गांव में स्थित है ?

(2) ऐसे प्रत्येक आवेदन के साथ विनियम में दिये जाने एवं प्राप्त किये जाने वाले भूखण्डों से सम्बन्धित खतौनी की प्रमाणित प्रतियां भी संलग्न होंगी।

***नियम 101. ग्राम पंचायत की भूमि के विनिमय के लिए आवेदन (धारा 101)***

(1) धारा 101 (1) के खण्ड (ख) के अधीन भूमिधर द्वारा विनिमय के लिए दिये गये प्रत्येक आवेदन में निम्नलिखित विवरण होंगे

(क) नियम 100 (1) में विनिर्दिष्ट विवरण ।

(ख) क्या ग्राम पंचायत से विनिमय में प्राप्त की जाने वाली भूमि नियोजित उपयोग के लिये आरक्षित है अथवा ऐसी भूमि है जिसमें भूमिधरी अधिकार उद्भूत नहीं होता है।

(ग) क्या ग्राम पंचायत से विनिमय में प्राप्त की जाने वाली भूमि पर कोई वृक्ष या आस्तियां हैं यदि हां तो उसका विवरण।

(2) ऐसे सभी आवेदनों के साथ विनिमय में प्राप्त व दिये जाने वाले भूखण्डों की प्रमाणित खतौनी व भूमि प्रबन्धक समिति द्वारा ऐसे विनिमय के पक्ष में पारित किये गये प्रस्ताव की प्रति संलग्न की जायेगी।

***नियम 102. उप-जिलाधिकारी द्वारा विनिमय की अनुमति प्रदान किया जाना (धारा 101 और 102 )***

(1) नियम 100 अथवा नियम 101 के अन्तर्गत आवेदन प्राप्त होने पर उप-जिलाधिकारी भूमिधर या सम्बन्धित ग्राम पंचायत को इस आशय का कारण बताओ नोटिस जारी करेगा कि क्यों न विनिमय की अनुमति प्रदान कर दी जाय ?

(2) उप-जिलाधिकारी विनिमय में ली या दी जाने वाली भूमि के बाजार मूल्य का आगणन करायेगा और यदि कोई पट्टाधारक, बन्धकदार या अन्य कोई भारधारक यदि कोई हो तो सुनवाई करेगा।

(3) आवश्यक जांच करने के पश्चात् यदि उप-जिलाधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि पक्षकार ऐसे विनिमय के लिए सहमत है और धारा 101 (2) के प्रावधानों का उल्लंघन नहीं है तो वह ऐसे विनिमय की अनुमति देगा और तद्नुसार अधिकार अभिलेख (खतौनी) में संशोधन करने के लिए निदेश देगा।

(4) यदि उपधारा (1) के खण्ड (ख) में अभिदिष्ट भूमि के सम्बन्ध में आवेदन है और यदि वह नियोजित प्रयोग के लिये आरक्षित है अथवा ऐसी भूमि है जिसमें भूमिधरी अधिकार उद्भूत नहीं होते हैं और उप-जिलाधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि विनिमय की अनुज्ञा आवेदक के हित में और जनहित में भी है तो वह मामले को समुचित आदेश के लिये राज्य सरकार को सन्दर्भित कर सकेगा और यदि राज्य सरकार द्वारा अनुज्ञा प्रदान की जाती है तो उप-जिलाधिकारी अधिकार अभिलेख (खतौनी) को तद्नुसार
संशोधित करने का निदेश देगा।

शादी के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया क्या हैहिंदू मैरिज, मुस्लिम मैरिज या कोई स्पेशल मैरिज इन तीनों के तहत होने वाली शादियों...
23/08/2022

शादी के रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया क्या है

हिंदू मैरिज, मुस्लिम मैरिज या कोई स्पेशल मैरिज इन तीनों के तहत होने वाली शादियों को रजिस्ट्रेशन किया जाता है। ऐसा रजिस्ट्रेशन दो जगहों पर किया जाता है कुछ स्टेट में यह रजिस्ट्रेशन नगर निगम या फिर ग्राम पंचायत द्वारा किया जाता है या फिर कुछ स्टेट में ऐसा रजिस्ट्रेशन एसडीएम के दफ्तर से किया जाता है। इस रजिस्ट्रेशन को पक्षकारों की शादी के बाद किया जाता है। जैसे कि पति और पत्नी ने किसी एक तारीख को फेरे लेकर शादी संपन्न की है तब उस तारीख के कुछ दिनों बाद पति पत्नी अपनी शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन नगर निगम या फिर एसडीएम के दफ्तर में देते है।

क्या दस्तावेज जरूरी है:- ऐसी शादी के रजिस्ट्रेशन के लिए कुछ दस्तावेजों की जरूरत है। उन दस्तावेजों में सबसे पहला दस्तावेज शादी के रजिस्ट्रेशन का आवेदन फार्म है। आजकल ऐसी शादी के रजिस्ट्रेशन का फॉर्म ऑनलाइन कर दिया गया है और ऑनलाइन फॉर्म के माध्यम से भी शादी का रजिस्ट्रेशन का फॉर्म भरा जा सकता है। इस फॉर्म के साथ कुछ जरूरी दस्तावेजों को संलग्न किया जाता है जैसे-
पति-पत्नी का आधार कार्ड।
शादी की पत्रिका।
पंडित का शपथ पत्र और उसका आधार कार्ड। मौलवी के पढ़ाई निकाह का निकाह नामा।
शादी की जगह।
पक्षकारों का शपथ पत्र जिसमें यह उल्लेख होना चाहिए कि पक्षकार आपस में प्रतिबंधित नातेदारी में नहीं है।

प्रतिबंधित नातेदारी उसे कहते हैं जिन रिश्तेदारी में शादी नहीं होती है। जैसे कि हिंदू मैरिज में ऐसी नातेदारी को बहुत महत्व दिया गया है। अगर ऐसी नातेदारी में शादी होती है तो शादी अवैध मानी जाती है। मुस्लिम मैरिज में भी प्रतिबंधित नातेदारी है पर इतनी नहीं है जैसे की मां बेटे खाला भांजे आपस में शादी नहीं कर सकते हैं और भी दूसरे रिश्ते हैं जिनमें शादियां नहीं हो सकती हैं। शपथ पत्र के जरिए पति और पत्नी यह घोषणा करते हैं कि हमारी शादी किसी भी प्रतिबंधित नातेदारी में नहीं हुई है। आवेदन कहां करना है- शादी के पति और पत्नी ऐसे आवेदन को किसी भी उस शहर में कर सकते हैं जहां रहे हैं या फिर जहां पर उनकी शादी हुई थी। दोनों ही जगह के शहरों में ऐसा आवेदन किया जा सकता है। ऐसे आवेदन के साथ एक नॉमिनल कोर्ट फीस होती है जो पक्षकारों को अदा करना होती है जैसे कि कुछ 100 से ₹200 के टिकट होते हैं उन्हें दस्तावेजों के साथ लगाना होता

20/08/2022

जानिए लिव इन रिलेशनशिप से संबंधित भारतीय कानून

आधुनिक समय में लिव इन रिलेशनशिप का चलन बढ़ता जा रहा है। कामकाजी युवा शादी के स्थान पर लिव इन रिलेशनशिप को भी महत्व दे रहे हैं। लिव इन... बड़े नगरों में अधिक उपयोग में लाया जाता है। महिला-पुरुष का बगैर विवाह के एक साथ रहने की वाली व्यवस्था को लिव इन रिलेशनशिप कहा जाता है।
लिव इन... पश्चिम की जीवन शैली है तथा भारतीयों ने इसे तेजी से अपनाना शुरू किया है। विवाह में जाति तथा धार्मिक बंधन तथा अन्य बंधन होने के कारण युवक-युवती लिव इन में साथ रहने को प्राथमिकता देने लगे हैं

लिव इन अपराध नहीं।

सामाजिक स्तर पर लिव इन को भले ही मान्यता नहीं दी जाती हो तथा विभिन्न धर्मों में इसे मान्यता न दी जाती हो परंतु भारतीय विधि लिव इन को कोई अपराध नहीं मानती। भारत में लिव इन जैसी प्रथा वैध है तथा कोई भी दो लोग लिव मेंं इन रह सकते हैं, यह भारतीय विधि में पूर्णतः वैध है।

लिव इन की महिला पक्षकार को भरण पोषण का अधिकार

चनमुनिया बनाम वीरेंद्र कुमार चनमुनिया —के मामले में उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट करते हुए यह कहा है कि लिव इन की महिला पक्षकार लिव इन के पुरुष पक्षकार से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार रखती है तथा महिला को यह कहकर भरण पोषण के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता कि उसने कोई वैध विवाह नहीं किया था।
यदि दोनों पक्ष कार पति-पत्नी की भांति एक साथ लिव इन जैसी व्यवस्था में रहे थे तो महिला पक्षकार पुरुष पक्षकार से दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत भरण पोषण की मांग कर सकती है।

लिव इन से उत्पन्न हुई संतान को संपत्ति में उत्तराधिकार

लिव इन की अवधि में साथ रहते हुए लिव इन के पक्षकारों में यदि कोई संतान उत्पन्न होती है तो इस प्रकार से उत्पन्न हुई संतान को पिता की संपत्ति में तथा माता की संपत्ति में और इन दोनों को विरासत में मिली हुई संपत्ति में उत्तराधिकार का इस भांति ही अधिकार होगा, जिस भांति एक वैध विवाह से उत्पन्न हुई संतानों को होता है। यह बात रविंद्र सिंह बनाम मल्लिका अर्जुन के मामले में 2011 को भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा कही गयी।

नंदकुमार बनाम स्टेट ऑफ केरला के मामले में यह कहा गया है कि यदि पुरुष की आयु विवाह के समय 21 वर्ष नहीं थी तथा वह पुरुष 18 वर्ष से अधिक का था तो ऐसी परिस्थिति में

14/08/2022

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 में देश के नागरिकों के लिए 6 स्वतंत्रताओं का वर्णन किया गया है, जो कि निम्न हैं

विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

अस्त्र - शस्त्र रहित और शांतिपूर्ण सम्मलेन की स्वतंत्रता

समुदाय और संघ निर्माण की स्वतंत्रता

भ्रमण की स्वतंत्रता

निवास की स्वतंत्रता

व्यवसाय की स्वतंत्रता

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