22/08/2026
गैदान (गोदान);
गाँव में जब किसी भी बेटी की शादी होती थी, तो सबसे मर्मस्पर्शी दृश्य होता था गैदान।
रात को फेरे लेने के बाद सुबह सूर्यनारायण के दर्शनों के साथ अपने चौक (आँगन) में वर और ब्योली (दुल्हन) के लिए दो कुर्सियां लगायी जाती थी; उनके आगे बिछाई जाती थी एक फोल्डिंग चारपाई या लकड़ी का दिवान और सामने बाँधी जाती थी एक रस्सी।
सामने फ़ोल्डिंग चारपाई या दिवान पर रखी जाती थी देजे (दहेज़) वाली सारी वस्तुएं; जैसी कि चाची द्वारा लाया हुआ बँठा और गागर, बौडी (तायी जी) द्वारा दिया गया विस्तरबंद, जिसके अंदर होती थी रजाई, गद्दा, दो तकिये और चादर, पूफू (बुआ) द्वारा दिया गया बर्तनों का सैट, मामी द्वारा दिया गया प्रेशर कुकर इत्यादि गृहस्थी का सारा सामान।
ख़ास चाची, तायी, बुआ, मामी और बड़ी दीदी तो इन वस्तुओं के साथ साथ अपनी सामर्थ्यनुसार कुछ महंगी वस्तु भी देते थे, जैसे कि सोने के कान के कुंडल, सोने की चैन, चाँदी की पायजेब इत्यादि।
चारपाई पे सबसे आगे सजाया जाता था ससुराल पक्ष से आया हुआ श्रृंगारदान, साड़ी-ब्लाउज का सैट और कुछ गहने।
इसके बाद सबसे सुंदर दृश्य शुरू होता था; गाँव की प्रत्येक मातृशक्ति को इस कार्यक्रम का हिस्सा होना होता था; जो भी महिला आएगी वो सबसे पहले अपने द्वारा लायी हुई वधू के लिए धोती (साड़ी) रस्सी के अपर रखेंगी और उसके बाद वर-ब्योली की परिक्रमा करेंगी और उनके आगे की तरफ़ पहुँच के दोनों के पैर छू के वर वधू के हाथ में दक्षिणा रखते थे; ये सिलसिला तब तक चलता रहता था जब तक गाँव की हर मातृशक्ति, वर-वधू को कुछ ना कुछ उपहार ना दे दे; गाँव की मातृशक्तियों द्वारा दी गयी धोतियों से रस्सी लटकने लगती थी।
जब बेटी की माँ-पिताजी, चाचा-चाची, ताया-तायी, मामा-मामी, दीदी-जीजाजी और बुआ, आशीर्वाद देने के लिए उठते थे तो दृश्य बहुत ही भावुक हो जाता था, सबकी आँखें नम हो जाती थी (ये लिखते हुए, लेखक की आँखें भी नम हो रही हैं)।
ये एक ऐसी प्रथा थी, जिसमें पूरा गाँव बेटी को नई गृहस्थी शुरू करने के लिए सारा सामान देते थे; ससुराल पक्ष से कभी कोई माँग नहीं होती थी; एक दिलचस्प बात ये होती थी कि ससुराल पक्ष और बेटी के माँ-पिताजी आपस में बात करके ये निर्णय लेते थे कि अगर गले का गुलोबंद (गले का हार) आप दे रहे हो तो नथुली (नथ) हम बना लेते हैं; आपसी तालमेल से बेटी के लिए गहने बनाये जाते थे, जिससे किसी एक पक्ष पर ज़्यादा भार ना पड़े।
ये सुंदर कार्यक्रम गाय के दान (गैदान/गोदान) के साथ समाप्त होता था और तब चलती थी मेहमानों के लिए चाय और पेपर प्लेट में लड्डू, दो बिस्किट और थोड़ा नमकीन।
दगड़ियो अब तो “देजे रूपी आशीर्वाद” ने “दहेज रूपी श्राप” का आवरण अपना लिया है, जिसका विष सदैव हमारी बेटी को ही पीना पड़ता है और हम अपनी आँखों के सामने अपनी सैतीं-पालीं बेटी को हलाहल होते देखते हैं …