Sanjay Sharma Darmora

Sanjay Sharma Darmora जय बाबा केदार , करो सबका उद्धार ।

गैदान (गोदान);गाँव में जब किसी भी बेटी की शादी होती थी, तो सबसे मर्मस्पर्शी दृश्य होता था गैदान। रात को फेरे लेने के बाद...
22/08/2026

गैदान (गोदान);

गाँव में जब किसी भी बेटी की शादी होती थी, तो सबसे मर्मस्पर्शी दृश्य होता था गैदान।

रात को फेरे लेने के बाद सुबह सूर्यनारायण के दर्शनों के साथ अपने चौक (आँगन) में वर और ब्योली (दुल्हन) के लिए दो कुर्सियां लगायी जाती थी; उनके आगे बिछाई जाती थी एक फोल्डिंग चारपाई या लकड़ी का दिवान और सामने बाँधी जाती थी एक रस्सी।

सामने फ़ोल्डिंग चारपाई या दिवान पर रखी जाती थी देजे (दहेज़) वाली सारी वस्तुएं; जैसी कि चाची द्वारा लाया हुआ बँठा और गागर, बौडी (तायी जी) द्वारा दिया गया विस्तरबंद, जिसके अंदर होती थी रजाई, गद्दा, दो तकिये और चादर, पूफू (बुआ) द्वारा दिया गया बर्तनों का सैट, मामी द्वारा दिया गया प्रेशर कुकर इत्यादि गृहस्थी का सारा सामान।

ख़ास चाची, तायी, बुआ, मामी और बड़ी दीदी तो इन वस्तुओं के साथ साथ अपनी सामर्थ्यनुसार कुछ महंगी वस्तु भी देते थे, जैसे कि सोने के कान के कुंडल, सोने की चैन, चाँदी की पायजेब इत्यादि।

चारपाई पे सबसे आगे सजाया जाता था ससुराल पक्ष से आया हुआ श्रृंगारदान, साड़ी-ब्लाउज का सैट और कुछ गहने।

इसके बाद सबसे सुंदर दृश्य शुरू होता था; गाँव की प्रत्येक मातृशक्ति को इस कार्यक्रम का हिस्सा होना होता था; जो भी महिला आएगी वो सबसे पहले अपने द्वारा लायी हुई वधू के लिए धोती (साड़ी) रस्सी के अपर रखेंगी और उसके बाद वर-ब्योली की परिक्रमा करेंगी और उनके आगे की तरफ़ पहुँच के दोनों के पैर छू के वर वधू के हाथ में दक्षिणा रखते थे; ये सिलसिला तब तक चलता रहता था जब तक गाँव की हर मातृशक्ति, वर-वधू को कुछ ना कुछ उपहार ना दे दे; गाँव की मातृशक्तियों द्वारा दी गयी धोतियों से रस्सी लटकने लगती थी।

जब बेटी की माँ-पिताजी, चाचा-चाची, ताया-तायी, मामा-मामी, दीदी-जीजाजी और बुआ, आशीर्वाद देने के लिए उठते थे तो दृश्य बहुत ही भावुक हो जाता था, सबकी आँखें नम हो जाती थी (ये लिखते हुए, लेखक की आँखें भी नम हो रही हैं)।

ये एक ऐसी प्रथा थी, जिसमें पूरा गाँव बेटी को नई गृहस्थी शुरू करने के लिए सारा सामान देते थे; ससुराल पक्ष से कभी कोई माँग नहीं होती थी; एक दिलचस्प बात ये होती थी कि ससुराल पक्ष और बेटी के माँ-पिताजी आपस में बात करके ये निर्णय लेते थे कि अगर गले का गुलोबंद (गले का हार) आप दे रहे हो तो नथुली (नथ) हम बना लेते हैं; आपसी तालमेल से बेटी के लिए गहने बनाये जाते थे, जिससे किसी एक पक्ष पर ज़्यादा भार ना पड़े।

ये सुंदर कार्यक्रम गाय के दान (गैदान/गोदान) के साथ समाप्त होता था और तब चलती थी मेहमानों के लिए चाय और पेपर प्लेट में लड्डू, दो बिस्किट और थोड़ा नमकीन।

दगड़ियो अब तो “देजे रूपी आशीर्वाद” ने “दहेज रूपी श्राप” का आवरण अपना लिया है, जिसका विष सदैव हमारी बेटी को ही पीना पड़ता है और हम अपनी आँखों के सामने अपनी सैतीं-पालीं बेटी को हलाहल होते देखते हैं …

सातू-आठू के पावन पर्व पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।देवभूमि की समृद्ध लोकपरंपरा, संस्कृति और आस्था सदैव यूँ ही जीवंत रह...
20/08/2026

सातू-आठू के पावन पर्व पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं।
देवभूमि की समृद्ध लोकपरंपरा, संस्कृति और आस्था सदैव यूँ ही जीवंत रहे। 🙏🌸
जय देवभूमि, जय उत्तराखंड! 🌿🏔️



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एक बटन की क़ीमत तुम क्या जानो साहब;जी हाँ एक बटन की क़ीमत हर कोई नहीं बता सकता, इसकी क़ीमत अगर कोई बता सकता है तो वो है ...
18/08/2026

एक बटन की क़ीमत तुम क्या जानो साहब;

जी हाँ एक बटन की क़ीमत हर कोई नहीं बता सकता, इसकी क़ीमत अगर कोई बता सकता है तो वो है “गुच्छी खेलने वाला”। गुच्छी उत्तराखंड के गांवों में एक बेशर्म खेल माना जाता था, जिसको बड़े-बुजुर्गों से छुप छुप कर खेला जाता था।

गुच्छी खेलने के लिए किसी समतल जगह को चुना जाता था और पत्थर से ज़मीन पर एक छोटा सा गड्ढा किया जाता था; गड्ढे से करीब करीब २ मीटर की दूरी पर एक लाइन खींची जाती थी, जहाँ से शुरू होता था खेल।

गुच्छी दो तरह से खेली जाती थी; जिनके पास थोड़े पैसे होते थे, वो पैसों से खेलते थे और जिनकी जेब ख़ाली होती थी, वो ये खेल बटन से खेलते थे। जितने बच्चे खेलने के इच्छुक होंगे वो या तो पैसे रखेंगे या बटन; खेल की सामग्री इकट्ठा होने पर खिंची हुई लाइन से गड्ढे में पहले एक सिक्का डालना होता था, जो भी सिक्का गड्ढे में डाल पाया वो टॉस जीत जाता था और टॉस जीतने वाला फिर सारे जमा किए हुए पैसे या बटन इकट्ठे उस गड्ढे में डालता था, जितने सिक्के या बटन गड्ढे में गए वो आपके, बचे हुए सिक्के या बटन जो ज़मीन पर इधर उधर गिरे होते थे उनमें से पूछा जाता था कि किसपे “सिस्त” (निशाना) लगानी है। बताए हुए सिक्के या बटन पर सिस्त लग गई तो सारे पैसे/बटन आपके, लेकिन गलती से निशाना किसी दूसरे पे लग गया तो गड्ढे में गिरे हुए पैसे तो वापस होंगे ही साथ में देना होता था “दंड”।

कई बच्चे इतने गुच्छ्योर होते थे की पहली ही बार में सारे पैसे या बटन जीत जाते थे, हम जैसे बच्चे एक-एक करके अपनी क़मीज़ के बटन तोड़ कर दांव पर लगा देते थे, जब क़मीज़ के सारे बटन ख़त्म तो खेल भी ख़त्म।

अब डर होता था कि बिना बटन की क़मीज़ पहन कर घर कैसे जायें; तो फिर शुरू होती थी छोटे से पत्थर से बटन बनाने की प्रक्रिया; छोटे से पत्थर को रगड़ कर समतल किया जाता था और बटन के आकार का गोल किया जाता था, फिर उसको क़मीज़ के बटन वाली जगह पर नीचे की तरफ़ लगा के काज (buttonhole) में फँसाया जाता था।

अब नहीं मिलेंगे साहब आपको ऐसे कलाकार दर्ज़ी बच्चे…

इंद्रमणि बडोनी जी की पुण्यतिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि। 🙏उत्तराखंड की अस्मिता, संस्कृति और राज्य आंदोलन के लिए उनका संघर...
18/08/2026

इंद्रमणि बडोनी जी की पुण्यतिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि। 🙏
उत्तराखंड की अस्मिता, संस्कृति और राज्य आंदोलन के लिए उनका संघर्ष सदैव हमारी प्रेरणा बना रहेगा।
उनके विचार और योगदान आने वाली पीढ़ियों को सदैव दिशा देते रहेंगे।
उत्तराखंड के गांधी को शत-शत नमन। 🌺
ॐ शांति। 🙏



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महान स्वतंत्रता सेनानी एवं आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि। भारत...
18/08/2026

महान स्वतंत्रता सेनानी एवं आजाद हिंद फौज के संस्थापक नेताजी सुभाष चन्द्र बोस जी की पुण्यतिथि पर विनम्र श्रद्धांजलि। भारत की स्वतंत्रता के लिए उनका अदम्य साहस, नेतृत्व और सर्वोच्च समर्पण राष्ट्र के इतिहास में सदैव स्मरणीय रहेगा। 🙏🇮🇳




AmitShah
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17/08/2026

आज उत्तराखंड के पारम्परिक त्यौहार घी संक्रांति के शुभ अवसर पर भगवान का घी से अभिषेक करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

हर हर महादेव

घी संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं! 🌿🙏उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और परंपरा सदा समृद्ध रहे।जय उत्तराखंड!        mahendrabha...
17/08/2026

घी संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं! 🌿🙏
उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और परंपरा सदा समृद्ध रहे।
जय उत्तराखंड!



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भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री एवं प्रखर वक्ता, महान राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी जी की पुण्यतिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि। ...
16/08/2026

भारत रत्न, पूर्व प्रधानमंत्री एवं प्रखर वक्ता, महान राजनेता अटल बिहारी वाजपेयी जी की पुण्यतिथि पर भावपूर्ण श्रद्धांजलि। राष्ट्रसेवा, लोकतांत्रिक मूल्यों और सुशासन के प्रति उनका समर्पण सदैव स्मरणीय रहेगा। 🙏🇮🇳



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AtalBihariVajpayee Punyatithi

स्वतंत्रता के 80वें गौरवपूर्ण वर्ष के अवसर पर सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ। हमारा तिरंगा सदैव शान से लहराता रहे ...
15/08/2026

स्वतंत्रता के 80वें गौरवपूर्ण वर्ष के अवसर पर सभी देशवासियों को हार्दिक शुभकामनाएँ। हमारा तिरंगा सदैव शान से लहराता रहे और भारत निरंतर प्रगति, समृद्धि एवं आत्मनिर्भरता के पथ पर आगे बढ़ता रहे। 🇮🇳✨

#स्वतंत्रता_दिवस


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माँ का संगीत, बरखा, जंद्रू, पर्या के साथ;अगर आपने १९८०-९० में उत्तराखंड का जीवन जिया है तो आप समझ ही गए होंगे की मैं किस...
13/08/2026

माँ का संगीत, बरखा, जंद्रू, पर्या के साथ;

अगर आपने १९८०-९० में उत्तराखंड का जीवन जिया है तो आप समझ ही गए होंगे की मैं किस बारे में आपको कथा सुनाने वाला हूँ;

दगड़ियो सावन के महीने की बरखा (बरसात) रात को शुरू हुई और सुबह तक चल रही है; आप सोए हुए हो और अचानक आपके कानों में भीनी भीनी आवाज़ आती है माँ के जंदरे की (घरेलू आटा पीसने की चक्की, जिसको हाथ से घुमाया जाता है); माँ बायें हाथ से जंदरे को घुमा रही हैं और दायें हाथ से उसमें गेहूँ डाल रही है; क्या तारतम्यता थी;

इस तारतम्यता के साथ शुरू होती है आपके कानों में वो संगीत गूँजने की, जो दुनिया का बड़ा से बड़ा संगीतज्ञ ना बजा और सुना सकता था, जो मेरी माँ जंदरे के साथ आपके कानों में रस घोल के सुनाती थी; सुबह के ५ बज रहे हैं और जंदरे से ये संगीत की आवाज़, वैसे ही नींद अपने अल्हड़पन में होती थी, लेकिन ये आवाज़ सुन के आप पहुँच जाते थे ऐसी दुनिया में जहाँ सिर्फ़ आवाज़ है बरखा के “टप टप टप” की और जंदरे के “घूँ घूँ घूँ” की।

मुझे गहरी नींद में सुलाने में माँ का ही हाथ होता था, कभी जंदरे का संगीत तो आज सुबह सुबह माँ शुरू हो गई पर्या (छाँझ छोलने का लकड़ी का बर्तन) में छाँस छोलने के लिए; हे भगवान कैसा संगीत था पर्या का! बड़ी तारतम्यता के साथ “घर्र घर्र घर्र घर्र”; और हाँ पर्या से छाँस छोलने में सिर्फ़ संगीत ही नहीं था एक अजीब सा नृत्य भी था जो छाँस छोलते हुए आपको दिखायी देता था।

अब जनाब आप लाट-साहब हो गए हो, तो जंदरे और पर्या ने अपना संगीत देना बंद कर दिया, और उस विलुप्त संगीत के साथ आपकी नींद भी विलुप्त हो गई है…

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Rudraprayag

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