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इलाहाबाद उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय"आरोपी-ग्राहक द्वारा अधिवक्ता को दी गई प्रोफेशनल फीस 'अपराध की आय' (Proceeds ...
03/07/2026

इलाहाबाद उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय
"आरोपी-ग्राहक द्वारा अधिवक्ता को दी गई प्रोफेशनल फीस 'अपराध की आय' (Proceeds of Crime) नहीं मानी जा सकती, जब तक कि स्वयं अधिवक्ता अपराध में संलिप्त न हो।"

अधिवक्ता को उसके पेशेवर कार्य के बदले मिली फीस वैध पारिश्रमिक (Lawful Remuneration) है।
केवल इसलिए कि मुवक्किल किसी अपराध का आरोपी है, अधिवक्ता की फीस को 'Proceeds of Crime' नहीं माना जा सकता।
यदि अधिवक्ता के अपराध में शामिल होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं है, तो उसके बैंक खाते को केवल फीस प्राप्त होने के आधार पर फ्रीज़ नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने कहा कि अधिवक्ताओं को स्वतंत्र और निर्भीक होकर अपने मुवक्किल का प्रतिनिधित्व करने का अधिकार है।

तलाक शुदा बेटी की मृत्यु के बाद माँ होगी समझौता राशि की हकदार
24/05/2026

तलाक शुदा बेटी की मृत्यु के बाद माँ होगी समझौता राशि की हकदार

सीआरपीसी (CrPC) की धारा 125, जो अब नए कानून में BNSS की धारा 144 के समान है, के तहत पर्याप्त साधन होने के बावजूद पत्नी, ...
30/04/2026

सीआरपीसी (CrPC) की धारा 125, जो अब नए कानून में BNSS की धारा 144 के समान है, के तहत पर्याप्त साधन होने के बावजूद पत्नी, बच्चों या माता-पिता का भरण-पोषण न करने पर मजिस्ट्रेट मासिक भत्ता देने का आदेश दे सकते हैं। यह कानून तलाकशुदा महिलाओं (मुस्लिम महिलाओं सहित) और शारीरिक/मानसिक रूप से अक्षम वयस्क बच्चों पर भी लागू होता है।

एडवोकेट कुलदीप सिंह रावत✅🖋️

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1 आदेश का मूल सार (Core Order):सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्गों (National Highways) के Right of Way (ROW) में आने व...
20/04/2026

1 आदेश का मूल सार (Core Order):
सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय राजमार्गों (National Highways) के Right of Way (ROW) में आने वाले सभी अवैध अतिक्रमण – ढाबे, भोजनालय, दुकानें, होटल या कोई भी व्यावसायिक ढांचा – 60 दिनों के अंदर हटाने का सख्त निर्देश दिया है। जिला मजिस्ट्रेट (District Magistrate) को यह जिम्मेदारी सौंपी गई है कि वे CNH Act की प्रक्रिया और SOP के तहत इन अवैध निर्माणों को हटाएँ।

2 पृष्ठभूमि – क्यों आया यह आदेश?

यह Suo Motu Writ Petition (Civil) No. 9/2025 (In Re: Phalodi Accident) का हिस्सा है। नवंबर 2025 में राजस्थान के फलोदी और तेलंगाना के रंगारेड्डी में हुए दो बड़े हादसों में कुल 34 लोगों की मौत हुई थी। कोर्ट ने पाया कि हाईवे किनारे बने अवैध ढाबे और अनधिकृत पार्किंग दुर्घटनाओं का बड़ा कारण हैं। इसलिए कोर्ट ने आर्टिकल 21 (जीवन का अधिकार) के तहत “सुरक्षित यात्रा का अधिकार” को मौलिक अधिकार माना और पैन-इंडिया इंटरिम डायरेक्शन्स जारी किए।

समझौते में भविष्य के गुजारा भत्ते का त्याग अमान्य:-पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्टपंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया ह...
16/04/2026

समझौते में भविष्य के गुजारा भत्ते का त्याग अमान्य:-पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी समझौते में भविष्य में मिलने वाले गुजारा भत्ते का पूर्ण त्याग विधिसम्मत नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि भरण-पोषण का अधिकार केवल व्यक्तिगत सहमति का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय से जुड़ा दायित्व है।

यह निर्णय स्पष्ट करता है कि निजी समझौते कानून से ऊपर नहीं हो सकते। जरूरतमंद व्यक्ति का वैधानिक अधिकार परिस्थितियों के अनुसार संरक्षित रहेगा, और न्यायालय आवश्यक होने पर हस्तक्षेप कर सकता है।
#पंजाब_हरियाणा_हाईकोर्ट #गुजारा_भत्ता ोषण #वैवाहिक_विवाद #कानूनी_अधिकार न्यायिक_निर्णय सामाजिक_विषय

🚨 “बड़ा वकील लाने से नहीं टलेगी सुनवाई!” — सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी जिसने पूरी लीगल कम्युनिटी को झकझोर दिया 🚨नई दिल...
16/04/2026

🚨 “बड़ा वकील लाने से नहीं टलेगी सुनवाई!” — सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी जिसने पूरी लीगल कम्युनिटी को झकझोर दिया 🚨

नई दिल्ली से आई यह बड़ी खबर न्याय व्यवस्था के मूल सिद्धांत — “न्याय में देरी, न्याय से इंकार” — को फिर से मजबूत करती है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा कि “इस धोखे में न रहें कि बड़ा वकील लाओगे तो केस स्थगित हो जाएगा।” यह टिप्पणी उस मामले में आई, जहां एक वकील ने अदालत से अनुरोध किया कि सुनवाई को कुछ सप्ताह के लिए टाल दिया जाए क्योंकि एक वरिष्ठ अधिवक्ता (सीनियर काउंसल) विदेश में हैं और वे लौटकर बहस करेंगे। लेकिन अदालत ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए साफ किया कि न्याय प्रक्रिया किसी व्यक्ति विशेष या ‘बड़े नाम’ पर निर्भर नहीं हो सकती।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि केवल इस आधार पर मामलों को टालने की अनुमति दी जाए, तो इससे न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और आम जनता के मामलों में अनावश्यक देरी होगी। हालांकि बाद में परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने सीमित रूप से सुनवाई स्थगित की, लेकिन साथ ही सख्त संदेश भी दिया कि कोर्ट की गरिमा और समय सर्वोपरि है, न कि किसी वकील की उपलब्धता।

यह फैसला उन सभी लोगों के लिए एक बड़ा संदेश है जो अक्सर यह मानते हैं कि महंगे या बड़े वकील के नाम पर केस को लंबा खींचा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्याय बराबरी के सिद्धांत पर चलता है, न कि प्रतिष्ठा या प्रभाव पर। यह कदम न केवल न्याय प्रणाली में पारदर्शिता और अनुशासन को बढ़ावा देता है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करता है कि हर व्यक्ति को समय पर न्याय मिले।

📢 आप क्या सोचते हैं? क्या कोर्ट का यह सख्त रुख सही है? अपनी राय जरूर दें!

सुप्रीम कोर्ट ने पति से अलग रह रही एक महिला की ओर से पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज घरेलू हिंसा का केस रद्द कर दिया है...
16/04/2026

सुप्रीम कोर्ट ने पति से अलग रह रही एक महिला की ओर से पति और उसके परिवार के खिलाफ दर्ज घरेलू हिंसा का केस रद्द कर दिया है. कोर्ट ने कहा कि अगर घरेलू हिंसा के केस में परिजनों पर कोई ठोस आरोप न हों तो मुकदमे को तुरंत खत्म कर देना चाहिए ताकि परिवार को बेवजह न घसीटा जाए.

16/04/2026
संपत्ति पर निषेधाज्ञा (Injunction on Property) एक अदालती आदेश है जो विवादित प्रॉपर्टी को बेचने, निर्माण करने या हस्तांतर...
16/04/2026

संपत्ति पर निषेधाज्ञा (Injunction on Property) एक अदालती आदेश है जो विवादित प्रॉपर्टी को बेचने, निर्माण करने या हस्तांतरण करने से रोकता है। यह विशिष्ट राहत अधिनियम, 1963 (Specific Relief Act) के तहत मामला लंबित रहने तक संपत्ति के संरक्षण के लिए जारी किया जाता है।

यह मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है: अस्थाई (Temporary) और स्थाई (Permanent)।निषेधाज्ञा से संबंधित मुख्य बातें:अस्थायी निषेधाज्ञा (Temporary Injunction): मामला चलने के दौरान (सुनवाई लंबित रहने तक) संपत्ति की यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखने के लिए जारी किया जाता है।स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction): मामले का फैसला होने के बाद अंतिम निर्णय के रूप में जारी की जाती है।

उद्देश्य: विवादित संपत्ति को बेचे जाने या उसमें अवैध निर्माण/कब्जा होने से रोकना।आधार: निषेधाज्ञा प्राप्त करने के लिए आवेदक को 'अपूरणीय क्षति' (ऐसी क्षति जिसकी भरपाई पैसों से न हो सके) का डर सिद्ध करना होता है।
प्रक्रिया और शर्तें:अदालत में वाद (Suit) दायर करना और निषेधाज्ञा के लिए आवेदन करना।प्रथम दृष्टया मामला (Prima Facie Case) मजबूत होना चाहिए।सुविधा का संतुलन (Balance of Convenience) वादी के पक्ष में होना चाहिए।उल्लंघन के परिणाम:यदि निषेधाज्ञा आदेश के बाद भी संपत्ति बेची या निर्माण किया जाता है, तो यह अदालत की अवमानना मानी जाती है, जिसके लिए दंड का प्रावधान है।

नोट: कानूनी सलाह के लिए किसी वकील से परामर्श लें।

केस का नाम: राहुल सुरुषे बनाम महाराष्ट्र राज्यकोर्ट: बॉम्बे हाईकोर्ट (औरंगाबाद बेंच)दो नाबालिग (लड़का 18, लड़की 16.9 साल...
15/04/2026

केस का नाम: राहुल सुरुषे बनाम महाराष्ट्र राज्य

कोर्ट: बॉम्बे हाईकोर्ट (औरंगाबाद बेंच)

दो नाबालिग (लड़का 18, लड़की 16.9 साल) ने प्यार में शादी कर ली, उनका एक बच्चा भी हो गया। लड़की के पिता ने POCSO Act और बाल विवाह कानून के तहत FIR दर्ज कराई।

बॉम्बे हाईकोर्ट ने पूरी FIR रद्द कर दी।

जहां दो नाबालिग प्यार में शादी कर लेते हैं और उनका बच्चा भी हो जाता है, वहां POCSO Act और बाल विवाह का केस चलाना सिर्फ बेवजह परेशान करना माना जाएगा।”

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