26/05/2026
विद्रोही
“हम फर्जी नहीं, रोज़ कमाने वाले अधिवक्ता हैं!”
आम अधिवक्ताओं की पीड़ा को समझे बिना यदि कोई यह कह दे कि “30 से 40 प्रतिशत अधिवक्ता फर्जी हैं”, तो यह केवल एक बयान नहीं, बल्कि हजारों संघर्षशील अधिवक्ताओं के आत्मसम्मान पर चोट है।
देश और झारखंड का आम अधिवक्ता कौन है?
वह कोई करोड़ों में खेलने वाला व्यक्ति नहीं होता।
वह रोज़ सुबह कोर्ट आता है…
फाइल लेकर दौड़ता है…
मुवक्किल का इंतज़ार करता है…
तारीख़ पर बहस करता है…
और शाम को जो कमाता है, उसी से घर चलता है।
किसी के बच्चे की फीस उसी से जाती है…
किसी की बूढ़ी माँ की दवा उसी से आती है…
किसी की पत्नी घर का राशन उसी आमदनी से चलाती है…
और किसी अधिवक्ता का पूरा परिवार सिर्फ उसके “आज की कमाई” पर निर्भर रहता है।
ऐसे में यदि बार काउंसिल के शीर्ष पदों पर बैठे लोग ही यह कहने लगें कि “30 से 40 प्रतिशत अधिवक्ता फर्जी हैं”, तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है।
यदि वास्तव में 30-40% अधिवक्ता फर्जी हैं,
तो फिर सवाल उठता है —
वर्ष 2015 में जो Verification Rules लाए गए, वह किसलिए लाए गए?
बार काउंसिल की मतदाता सूची कैसे बनी?
2026 के चुनाव में जो हजारों अधिवक्ताओं की वोटर लिस्ट तैयार हुई, उसका सत्यापन किस आधार पर हुआ?
क्या हजारों अधिवक्ताओं को बिना जाँच के सूची में शामिल कर लिया गया?
यदि ऐसा है, तो यह स्वयं व्यवस्था पर प्रश्नचिन्ह है।
और यदि ऐसा नहीं है,
तो फिर आम अधिवक्ताओं को बदनाम करने वाले बयान क्यों?
आज ज़रूरत इस बात की नहीं है कि संघर्ष कर रहे अधिवक्ताओं का मनोबल तोड़ा जाए।
ज़रूरत इस बात की है कि —
एडवोकेट प्रोटेक्शन एक्ट लागू हो,
अधिवक्ताओं के लिए मेडिकल स्कीम और इंश्योरेंस स्कीम मजबूत हो,
मृत्यु के बाद परिवार को डेथ क्लेम समय पर मिले,
अधिवक्ताओं के बच्चों के भविष्य के लिए योजना बने,
वृद्ध और आर्थिक रूप से कमजोर अधिवक्ताओं के लिए बजट में अलग प्रावधान हो।
बार काउंसिल और सरकार को यह समझना होगा कि
आम अधिवक्ता कोई “डेटा” नहीं है,
वह न्याय व्यवस्था की रीढ़ है।
जिस दिन आम अधिवक्ता टूट जाएगा,
उस दिन न्याय व्यवस्था की आत्मा कमजोर हो जाएगी।
आज भी हजारों अधिवक्ता ऐसे हैं जो
“रोज कमाओ — रोज खाओ”
की परिस्थिति में जीवन जी रहे हैं।
उनकी लड़ाई फर्जी डिग्री वालों से भी है,
भ्रष्ट सिस्टम से भी है,
और उस सोच से भी है
जो पूरे अधिवक्ता समाज को कटघरे में खड़ा कर देती है।
विद्रोही सवाल पूछता है —
क्या अधिवक्ताओं को सम्मान मिलेगा?
या केवल आंकड़ों में बदनाम किया जाएगा?
क्या उनके परिवार की चिंता होगी?
या सिर्फ बयानबाज़ी चलेगी?
समय आ गया है कि
आम अधिवक्ताओं की आवाज़ सुनी जाए,
उनके संघर्ष को समझा जाए,
और उनकी सुरक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान पर गंभीर नीति बनाई जाए।
हम फर्जी नहीं…
हम संघर्षशील अधिवक्ता हैं।
हम रोज़ कमाकर घर चलाने वाले लोग हैं।
जन-जन के साथ
संजय कुमार विद्रोही
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