Kundan Kumar Gautam

Kundan Kumar Gautam कार्यकर्ता - भीम आर्मी भारत एकता मिशन, बिहार
कार्यकर्ता - आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम), बिहार

12/02/2026

कान में जनेऊ लगाकर खुद को धर्म और ज्ञान का प्रतीक बताना बहुत आसान है। लेकिन अगर वही लोग तिरंगे के निशान का अपमान करें, तो ये सिर्फ गलत नहीं है - शर्मनाक है।

धर्म हमें क्या सिखाता है? संयम, सम्मान और मर्यादा।
अगर हमारे काम ही इन बातों के खिलाफ हों, तो फिर सिर्फ धागा पहन लेने से कोई धार्मिक या ज्ञानी नहीं बन जाता।

तिरंगा कोई साधारण चिन्ह नहीं है। वो हमारे देश की पहचान है, हमारे सैनिकों के बलिदान की याद है, हमारी आज़ादी का प्रतीक है। उसका अपमान करना मतलब उन भावनाओं का अपमान करना जो हर भारतीय के दिल में हैं।

असहमति रखना सबका हक है। गुस्सा भी हो सकता है। लेकिन अपनी नाराज़गी दिखाने के लिए देश के प्रतीक को निशाना बनाना सही रास्ता नहीं है।

देशभक्ति सिर्फ शब्दों से नहीं दिखती। धर्म सिर्फ दिखावे से साबित नहीं होता। सच्चाई हमारे व्यवहार में दिखती है — हम क्या करते हैं, कैसे बोलते हैं और किसका सम्मान करते हैं।

अगर सच में संस्कार हैं, तो वो हर काम में दिखाई देंगे।
और अगर देश से प्यार है, तो उसके तिरंगे का सम्मान सबसे पहले होगा। 🇮🇳

10/02/2026

कभी हमें भी अपने घर बुलाकर सम्मान के साथ खिलाइए, पंडिताइन जी।
जिन दलित और पिछड़े समाज के घरों में जाकर खाने की आप बात कर रही हैं,

उन्हीं घरों में वर्षों से आपके बाप-दादा भी खाते रहे हैं
और आज भी जारी है...

30/01/2026

बिहार के वैशाली से आई यह घटना हमारी सामाजिक व्यवस्था की क्रूर सच्चाई को सामने रख देती है। 91 वर्षीय झपकी देवी, जो महादलित समुदाय से थीं, उनके पार्थिव शरीर को श्मशान तक ले जाने के लिए रास्ता तक उपलब्ध नहीं कराया गया। पुलिस और प्रशासन मौके पर वाहन लेकर पहुँचे, लेकिन हालात बदलने में पूरी तरह नाकाम रहे। अंततः परिजनों को मजबूरी में सड़क के चौराहे पर ही अंतिम संस्कार करना पड़ा।

यह घटना बताती है कि हमारे समाज में भेदभाव जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि मृत्यु के बाद भी जाति ही यह तय करती है कि किसी इंसान की देह के साथ कैसा व्यवहार होगा। ऐसे में जब वास्तविकता इतनी अमानवीय हो, तब ‘जातिविहीन समाज’ की बातें करना और बहुसंख्यक समाज के न्याय को नजरअंदाज करना, एक कड़वी विडंबना बनकर रह जाता है।

यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि उस सामाजिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल है, जो बराबरी और इंसानियत के दावों के बावजूद सबसे कमजोर लोगों को उनका अंतिम सम्मान तक नहीं दे पा रही।

30/01/2026

प्रधानाध्यापक दिलीप कुमार (प्राथमिक विद्यालय सुरहूरपुर, सिरकोनी, जौनपुर) परिवार सर्वे के दौरान एक घर पहुँचे।
गर्मी थी, प्यास लगी—घर के व्यक्ति ने खुद गिलास में पानी दिया। दिलीप कुमार ने पानी पी लिया।

लेकिन जैसे ही जाति पता चली, वही व्यक्ति भड़क उठा—
“तुमने हमारा गिलास कैसे छुआ? पानी पीने की हिम्मत कैसे हुई?”

यानी पहले पानी पिलाया, फिर जाति जानकर अपमान!
आज भी कुछ लोगों की सोच में इंसान नहीं, जाति पहले आती है।

यह वही घिनौनी मनुवादी मानसिकता है जो शिक्षक जैसे सम्मानित पद पर बैठे व्यक्ति को भी “अछूत” मानने से नहीं हिचकती।

यह पुराना वीडियो आज फिर वायरल है—और वजह साफ़ है। UGC के नए कानून ऐसे ही रोज़मर्रा के जातिगत अपमान, भेदभाव और संस्थागत अन्याय पर नकेल कसने की कोशिश हैं।

जब कानून आता है, तो जिनकी सोच सदियों पुरानी है, वही सबसे ज़्यादा बिलबिलाते हैं।

UGC ज़रूरी है—
क्योंकि समस्या नई नहीं, सोच पुरानी और ज़हरीली है।
क्योंकि सम्मान पानी के गिलास से नहीं, संविधान से मिलता है।

30/01/2026

सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के विरोध में देश के विभिन्न हिस्सों में आवाज़ बुलंद हो रही है। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के फतेहपुर ज़िले में SC, ST और OBC समाज के हजारों अधिवक्ता सड़कों पर उतरे और UGC Act के समर्थन में ज़ोरदार आंदोलन किया।

अधिवक्ताओं का स्पष्ट कहना है कि यह कानून सामाजिक न्याय, समानता और वंचित वर्गों के अधिकारों की सुरक्षा से जुड़ा है। इसे कमजोर करने की कोई भी कोशिश संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।

28/01/2026

मऊ में सत्ता के दबाव और न्याय के सामने खड़े सच की एक गंभीर तस्वीर सामने आई है, जहाँ एक बलात्कार पीड़िता से “सेटलमेंट” कराने के उद्देश्य से तीन भाजपा नेता उसके घर तक पहुँचे और जनदबाव के बाद अब तीनों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई है।

पीड़िता का स्पष्ट कहना है कि भाजपा नेताओं ने उस पर समझौते का दबाव बनाया, धन का प्रस्ताव दिया और यह कहा गया कि आरोपी अंकित या तो उससे विवाह करे या फिर जेल जाए, लेकिन उसने दो टूक शब्दों में कह दिया कि वह किसी भी प्रकार का समझौता नहीं करेगी।

यह प्रकरण केवल एक अपराध तक सीमित नहीं है, बल्कि उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें पीड़िता को चुप कराने के लिए न्याय के स्थान पर सौदेबाज़ी का रास्ता चुना जाता है।

पीड़िता के साहस और जनता के दबाव के बाद पुलिस ने आरोपी को गिरफ़्तार किया तथा भाजपा के जिला उपाध्यक्ष संतोष कुमार सिंह उर्फ़ पन्नू, कन्हैया तिवारी और हिमांशु राय के विरुद्ध भी प्राथमिकी दर्ज करनी पड़ी।

प्रश्न यह है कि जब सत्ता का दबाव पीड़िता के घर तक पहुँच जाए, तो आम नागरिक न्याय की आशा किससे करे?

योगी जी कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में गुंडों का नहीं बल्कि प्रशासन का राज है, तो फिर यह बताना आवश्यक है कि दबाव बनाने वाले लोग आपकी ही पार्टी से जुड़े क्यों हैं?

यह संघर्ष अब केवल एक लड़की का नहीं रहा, बल्कि यह क़ानून बनाम प्रभाव और न्याय बनाम सत्ता की लड़ाई बन चुका है, और पीड़िता का यह एक वाक्य पूरे तंत्र को आईना दिखाता है कि वह किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं करेगी।

Chandra Shekhar Aazad

27/01/2026

क्या विद्यालयों में जातिगत भेदभाव नहीं होते हैं?

भारत के दो युगपुरुष कप्तान — एक साथ…!एक ओर वह नाम जिसने क्रिकेट के मैदान में भारत को विश्व विजेता बनाकर देश का सिर गर्व ...
15/01/2026

भारत के दो युगपुरुष कप्तान — एक साथ…!

एक ओर वह नाम जिसने क्रिकेट के मैदान में भारत को विश्व विजेता बनाकर देश का सिर गर्व से ऊँचा किया —
महेंद्र सिंह धोनी, विश्व कप विजेता कप्तान, आत्मविश्वास, संयम और नेतृत्व का प्रतीक।

दूसरी ओर वह युवा नेतृत्व, जिसने न्याय, समानता और संविधान की ताक़त के साथ सामाजिक संघर्षों को नई पहचान दी —
भीम आर्मी प्रमुख एवं नगीना लोकसभा सांसद चंद्रशेखर आज़ाद, जिन्हें टाइम मैगज़ीन की World Top 100 Personalities में स्थान मिला।

एक कप्तान ने खेल के ज़रिये देश को गौरवान्वित किया,
तो दूसरे कप्तान ने समाज के वंचितों, शोषितों और पीड़ितों की आवाज़ बनकर लोकतंत्र को मज़बूती दी।

दोनों का क्षेत्र अलग है, रास्ते अलग हैं,
लेकिन लक्ष्य एक ही है — भारत का मान, सम्मान और भविष्य।

इन दोनों महान व्यक्तित्वों पर हमें गर्व है —
देशवासियों को भी और हमारे भारत देश को भी।

आज के दौर में चंद्रशेखर आज़ाद सिर्फ़ एक नेता नहीं, बल्कि बहुजन समाज की धड़कन हैं।कड़ाके की ठंड में भी जब ज़्यादातर लोग ह...
11/01/2026

आज के दौर में चंद्रशेखर आज़ाद सिर्फ़ एक नेता नहीं, बल्कि बहुजन समाज की धड़कन हैं।

कड़ाके की ठंड में भी जब ज़्यादातर लोग हीटर और आरामदेह आवास की गर्माहट में सिमटे रहते हैं, तब चंद्रशेखर आज़ाद पीड़ित परिवार तक पहुँचने के लिए सड़कों पर दौड़ लगा रहे होते हैं। उनका एक ही संकल्प होता है — किसी भी हाल में पीड़ित के घर तक पहुँचना और उसके साथ खड़ा होना।

यही ज़मीनी नेतृत्व की पहचान है। बहुजन समाज को अब यह समझना होगा कि आलीशान कमरों में बैठकर, हीटर की हवा खाते हुए बराबरी और न्याय की राजनीति नहीं की जा सकती।

बहुजन आंदोलन को आगे बढ़ाने के लिए वही नेतृत्व चाहिए जो आराम नहीं, संघर्ष चुने — जो सत्ता के गलियारों से ज़्यादा पीड़ित की चौखट पर दिखाई दे।

Chandra Shekhar Aazad

इस व्यक्ति का जन्म किसी सुविधा या विरासत के लिए नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में बदलाव के लिए हुआ है। न कभी सोने का चम्मच ...
11/01/2026

इस व्यक्ति का जन्म किसी सुविधा या विरासत के लिए नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में बदलाव के लिए हुआ है। न कभी सोने का चम्मच मिला, न सत्ता का संरक्षण — फिर भी इसके एक इशारे पर लोग हक़ और इंसाफ़ के लिए खड़े हो जाते हैं। यही पहचान इसे साधारण नेता नहीं, बल्कि मास लीडर बनाती है। फर्श से अर्श तक पहुँचना प्रचार नहीं, जनता के भरोसे की कहानी है। 🔥🔥

जहाँ यह पहुँचता है, वहाँ सत्ता हरकत में आती है।
जहाँ यह आवाज़ उठाता है, वहाँ अन्याय छिप नहीं पाता।

मेरठ में कदम रखते ही
आरोपी की गिरफ्तारी हुई,
और पीड़ित लड़की को सकुशल रेस्क्यू कर न्याय की उम्मीद को मजबूती मिली।
यह सिर्फ़ नेतृत्व नहीं,
यह डर के ख़िलाफ़ खड़ा जनसैलाब है — जो बोलता है, लड़ता है और परिणाम लाता है।

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