25/01/2025
मुस्लिम जज
मामले की सुनवाई जस्टिस पंकज मिथल और अहसानुद्दीन अमानुल्लाह की पीठ कर रही थी
सुप्रीम कोर्ट से नहीं मिली ताहिर को जमानत, दो जजों ने सुनाया अलग-अलग फैसला
दिल्ली दंगो के मास्टरमाइंड आरोपी ताहिर हुसैन की चुनाव लडने के लिये जमानत याचिका पर अपनी एकतरफा निर्णय देते हुए जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्ला ने हाँ कहते हुए ये तर्क दिया कि "ताहिर हुसैन पाँच वर्षों से घर नहीं गया है।" ऐसे में कोई इस जज का मजहब क्यों न देखे?
क्योंकी न्याय से पहले दीन आता
दीन कहता सब मुस्लिम भाई भाई है और सब भाईयों की मदद करो
- क्या दिलबर नेगी, जिसके हाथ-पाँव काट कर उसके धड़ को आग में फेंक दिया, वो घर जा पाया?
- क्या IB अधिकारी अंकित शर्मा जिसे चार घंटों तक दो सौ लोग चाकुओं से गोदते रहे और फिर शव नाले मे दफना दिया, वो घर जा पाया?
- क्या कॉन्स्टेबल रतन लाल, जिसे बुर्काधारियों की भीड़ ने खींचा और उसके साथियो ने नृशंसता ले मार डाला, वो घर जा पाया?
- क्या वो 53 लोग घर जा पाए जो ताहिर हुसैन के कारण मारे गए?
जब तक आप केवल उसके मुसलमान होने पर फोकस्ड नहीं हो, किसी भी न्याय की पुस्तक में ऐसे दरिंदे को बेल देने के लिए ऐसे कुतर्क नहीं दिए जा सकते।
जिस व्यक्ति ने बिना खिड़की के घर बनाया, जिसने छतों पर पेट्रोल बम की बोतलें इकट्ठा की, जिसने मुसलमानों को छत पर बुलाया और चारों तरफ हथियार, पत्थर, पेट्रोल बम और टाइलों से हमला किया, एसिड की पाउचें फिंकवाई, उस आतंकवादी के लिए इतना प्रेम??
दिल्ली पुलिस को हर उस संसाधन का सहारा लेना चाहिए जो इसे लंबे समय तक जेल में रखे। ये है हमारी न्यायपालिका का ‘अंधा कानून’? अब क्या कानून के कान में मिट्टी डाल दी जाए ताकि वो जान न सके कि नाम क्या है!
हम इतने गिर गए हैं कि नाम देख कर, ऐसे निर्लज्ज तर्कों के साथ मुसलमान दंगाइयों का वैसे समय में बचाव करते है जबकि वही दंगे लाइव टीवी पर दिखाए जाते रहे? इस जज को उस कुर्सी पर बैठने का कोई अधिकार नहीं क्योंकि ऐसा प्रत्येक जज, उस हर जज की निष्पक्षता पर प्रश्न उठाता है जो जज तो अच्छा है, पर उसके नाम में उसका मजहब दिखता है।