31/01/2026
पेशेवर दायित्व के अंतर्गत अधिवक्ता की मात्र उपस्थिति या विधिक सलाह देना आपराधिक धमकी नहीं माना जा सकता : उच्चतम न्यायालय
उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में एक अधिवक्ता के विरुद्ध दर्ज आपराधिक धमकी (Criminal Intimidation) के प्रकरण को निरस्त करते हुए यह स्पष्ट किया कि अपने पेशेवर कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किसी मुवक्किल को दी गई सलाह अथवा सुझाव को आपराधिक धमकी नहीं माना जा सकता।
न्यायमूर्ति अरविंद कुमार एवं न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने यह अवलोकन किया—
“…अपने पेशेवर दायित्व के निर्वहन में केवल सलाह या सुझाव देने की हैसियत से किसी अधिवक्ता (वर्तमान अपीलकर्ता) की मात्र उपस्थिति को आपराधिक धमकी नहीं कहा जा सकता।”
यह मामला एक यौन अपराध से संबंधित था, जिसमें परिवादिनी (प्रॉसिक्युट्रिक्स) ने यह आरोप लगाया था कि अपीलकर्ता-अधिवक्ता ने उसे धमकाया एवं आपराधिक रूप से भयभीत किया। अभियोजन का कथन यह था कि धारा 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत दिए गए बयान में परिवादिनी ने आरोप लगाया कि मुख्य अभियुक्त के चाचा एवं दो बुआओं के साथ मिलकर अधिवक्ता ने उसे यौन उत्पीड़न के मामले में मुख्य अभियुक्त के पक्ष में झूठा बयान देने के लिए धमकाया।
उच्च न्यायालय द्वारा प्राथमिकी/आपराधिक कार्यवाही को निरस्त करने से इंकार किए जाने से आहत होकर अधिवक्ता ने उच्चतम न्यायालय का दरवाज़ा खटखटाया।
हालाँकि, उच्चतम न्यायालय ने यह महत्वपूर्ण तथ्य रेखांकित किया कि इससे पूर्व धारा 161 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत दर्ज बयान में परिवादिनी ने अधिवक्ता द्वारा किसी प्रकार की धमकी दिए जाने का कोई उल्लेख नहीं किया था, बल्कि केवल यह कहा था कि वह अधिवक्ता के घर गई थी। अधिवक्ता द्वारा धमकी दिए जाने का आरोप पहली बार सात दिन बाद धारा 164 के बयान में सामने आया।
न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय को निरस्त करते हुए परिवादिनी के बयानों में विरोधाभास की ओर संकेत किया और कहा—
“अपीलकर्ता का नाम अचानक सात दिनों के पश्चात सामने आया, जबकि प्रारंभिक चरण में धारा 161 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत दिए गए बयान में, कारण जो भी रहे हों, परिवादिनी ने अपीलकर्ता द्वारा किसी प्रकार की धमकी दिए जाने की बात का एक शब्द भी उल्लेख नहीं किया, सिवाय इसके कि वह उसके घर गई थी।”
न्यायालय ने आगे कहा—
“अतः हमारा यह सुविचारित मत है कि धारा 164 दण्ड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत दिए गए परिवादिनी के कथन मात्र के आधार पर अपीलकर्ता के विरुद्ध भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के अंतर्गत अभियोजन चलाना विधि की दृष्टि से पर्याप्त नहीं है।”
न्यायालय ने पुनः यह दोहराया कि—
“प्रथम दृष्टया ठोस एवं विश्वसनीय साक्ष्य से रहित, अस्पष्ट एवं सामान्य आरोप भारतीय दण्ड संहिता की धारा 506 के अंतर्गत अपराध का गठन नहीं कर सकते।”
धारा 506 भा.दं.सं. के लिए मात्र धमकी पर्याप्त नहीं
न्यायालय ने Naresh Aneja बनाम उत्तर प्रदेश राज्य तथा Sharif Ahmad बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामलों में दिए गए अपने पूर्व निर्णयों पर भरोसा करते हुए यह पुनः स्पष्ट किया कि केवल धमकी देना, जब तक उसमें भय उत्पन्न करने का स्पष्ट आशय न हो, आपराधिक धमकी नहीं माना जा सकता।
न्यायालय ने कहा—
“वर्तमान मामले में केवल शब्दों की अभिव्यक्ति, बिना किसी भय उत्पन्न करने की मंशा के, आपराधिक धमकी नहीं कही जा सकती।”
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 506 भा.दं.सं. के अंतर्गत अपराध सिद्ध करने के लिए यह आवश्यक है कि अभियुक्त की मंशा पीड़ित को भयभीत करने की हो, भले ही वास्तव में पीड़ित भयभीत हुआ हो या नहीं।
न्यायालय ने यह भी माना कि अपीलकर्ता एक अधिवक्ता है और अपने पेशेवर दायित्वों के अंतर्गत दी गई सलाह या सुझाव अथवा मात्र उपस्थिति को स्वतः ही धमकी नहीं माना जा सकता। न्यायालय के अनुसार, इस मामले में इस प्रकार का कोई आधारभूत तथ्य भी अभिलेख पर उपलब्ध नहीं था।
परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार की गई तथा अपीलकर्ता के विरुद्ध लंबित आपराधिक कार्यवाही को पूर्णतः निरस्त कर दिया गया।
वाद शीर्षक (Cause Title):
बेरी मनोज बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य
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एडवोकेट चंचल गुप्ता
विधिक सेवा लॉ फर्म
224, मिलिंदा मेनोर 2 आर एन टी मार्ग इंदौर
9302100010