28/04/2026
पुलिस की लापरवाही और प्रक्रिया की अनदेखी पड़ी भारी: सोनम रघुवंशी को मिली जमानत
गिरफ्तारी के आधार तक नहीं बता पाई जांच एजेंसी, कोर्ट ने माना मौलिक अधिकारों का उल्लंघन
शिलांग, 27 अप्रैल।
पूर्वी खासी हिल्स स्थित अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायालय ने हत्या सहित गंभीर धाराओं में आरोपी सोनम रघुवंशी को जमानत प्रदान करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को “गिरफ्तारी के आधार” (grounds of arrest) स्पष्ट रूप से न बताना संविधान के अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन है, जिससे गिरफ्तारी की वैधता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है।
अदालत के समक्ष यह तथ्य आया कि आरोपी को 9 जून 2025 को उत्तर प्रदेश के गाजीपुर से गिरफ्तार किया गया था और वह लगभग 10 माह से न्यायिक हिरासत में थी। पुलिस द्वारा 5 सितंबर 2025 को चार्जशीट दाखिल की गई तथा 28 अक्टूबर 2025 को आरोप तय हुए, किन्तु 90 में से मात्र 4 गवाहों के बयान ही दर्ज हो सके। इसके बाद पूरक चार्जशीट दाखिल होने और नए आरोपी के जुड़ने से ट्रायल प्रक्रिया बाधित हो गई।
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने यह महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठाया कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को केवल एक सामान्य प्रारूप (format) में सूचना दी गई, जिसमें न तो आरोपों के ठोस तथ्य थे और न ही वास्तविक धाराओं का सही उल्लेख। रिकॉर्ड के अवलोकन में भी यह सामने आया कि गिरफ्तारी से संबंधित विभिन्न दस्तावेजों में गलत धाराओं का उल्लेख किया गया तथा जिस धारा के तहत गंभीर आरोप था, उसकी जानकारी आरोपी को दी ही नहीं गई।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयों का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि “reasons for arrest” और “grounds of arrest” में मौलिक अंतर है। केवल औपचारिक कारण बताना पर्याप्त नहीं है, बल्कि आरोपी को उन विशिष्ट तथ्यों की जानकारी देना आवश्यक है जिनके आधार पर उसकी स्वतंत्रता छीनी जा रही है। ऐसा न होने पर न केवल अनुच्छेद 22(1), बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार (अनुच्छेद 21) का भी उल्लंघन माना जाएगा।
कोर्ट ने यह भी पाया कि इस गंभीर प्रक्रिया संबंधी त्रुटि के कारण आरोपी के बचाव के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव (prejudice) पड़ा। न्यायालय ने कहा कि चार्जशीट दाखिल हो जाने या ट्रायल शुरू हो जाने से इस प्रकार की संवैधानिक त्रुटि स्वतः वैध नहीं हो जाती।
इसके अतिरिक्त, अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि ट्रायल में अत्यधिक देरी हुई है, जो आरोपी के कारण नहीं है, और उसे अनिश्चितकाल तक हिरासत में रखना न्यायसंगत नहीं होगा। आरोपी के महिला होने, स्थायी निवास और आपराधिक पृष्ठभूमि न होने जैसे पहलुओं को भी सहायक कारक माना गया।
उपरोक्त तथ्यों एवं विधिक सिद्धांतों के आधार पर अदालत ने आरोपी को 50 हजार रुपए के निजी मुचलके तथा दो जमानतदारों पर जमानत देने का आदेश पारित किया। साथ ही यह शर्तें भी लगाई गईं कि वह साक्ष्यों से छेड़छाड़ नहीं करेगी, प्रत्येक सुनवाई में उपस्थित रहेगी तथा न्यायालय की अनुमति के बिना क्षेत्राधिकार से बाहर नहीं जाएगी।
यह आदेश एक बार फिर स्पष्ट करता है कि आपराधिक न्याय प्रणाली में पुलिस और जांच एजेंसियों द्वारा प्रक्रिया का पालन न करना सीधे तौर पर मामले को कमजोर कर सकता है और गंभीर आरोपों में भी आरोपी को राहत मिल सकती है।
अधिवक्ता चंचल गुप्ता
विधिक सेवा लॉ फर्म
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