क़ानूनी सलाह

क़ानूनी सलाह Advocate In Rajasthan High court Jaipur

बाद में विवाह का वादा टूटना शुरुआत से बेईमान इरादे के अभाव में धोखाधड़ी नहीं माना जा सकताः उड़ीसा उच्च न्यायालयकेस का शी...
12/08/2026

बाद में विवाह का वादा टूटना शुरुआत से बेईमान इरादे के अभाव में धोखाधड़ी नहीं माना जा सकताः उड़ीसा उच्च न्यायालय

केस का शीर्षकः एल.एस. बनाम उड़ीसा राज्य केस नंबरः 2009 का सीआरएलए नंबर 393

उडीसा उच्च न्यायालय का यह निर्णय विवाह के वादों से संबंधित आपराधिक कानून के एक महत्वपूर्ण पहलू को स्पष्ट करता है। यह स्थापित करता है कि अदालतों को सावधानीपर्वक जांच करनी चाहिए कि क्या वादा शुरू से ही झूठा था और धोखाधड़ी के डरादे से किया गया था। यह निर्णय केवल शादी के ट्टे वादों के आधार पर धोखाधड़ी के झूठे आरोपी व्यक्तियों को राहत प्रदान करता जिसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि शुरू से ही इरादा धारा 417 आईपीसी के तहत अपराध स्थापित करने में एक महत्वपूर्ण तत्व है।

03/08/2026

पारिवारिक न्यायालय (Family Court) में किसी भी मामले (जैसे कि तलाक, भरण-पोषण/Maintenance, बच्चों की कस्टडी, या वैवाहिक अध...
22/07/2026

पारिवारिक न्यायालय (Family Court) में किसी भी मामले (जैसे कि तलाक, भरण-पोषण/Maintenance, बच्चों की कस्टडी, या वैवाहिक अधिकारों की पुनर्स्थापना) के संचालन को मुख्य रूप से **5 महत्वपूर्ण चरणों** में बांटा जा सकता है।
यहाँ पारिवारिक न्यायालय की प्रक्रिया का एक मुख्य क्रम दिया गया है:
# # 1. याचिका/प्रार्थना पत्र दाखिल करना (Filing of Petition)
मामले की शुरुआत याचिकाकर्ता (Petitioner) द्वारा कोर्ट में केस दर्ज करने से होती है।
* **दस्तावेज और शपथ पत्र:** वकील के माध्यम से सही धाराओं के तहत याचिका तैयार कर, आवश्यक दस्तावेजों (जैसे शादी का कार्ड/प्रमाण पत्र, आईडी प्रूफ, फोटो) और शपथ पत्र (Affidavit) के साथ प्रस्तुत की जाती है।
* **समन जारी होना (Issuance of Notice/Summon):** कोर्ट याचिका को स्वीकार (Admit) करने के बाद विपक्षी पक्ष (Respondent) को कोर्ट में उपस्थित होने के लिए नोटिस या समन भेजती है।
# # 2. जवाब/लिखित बयान और मध्यस्थता (Reply & Counseling/Mediation)
पारिवारिक न्यायालय अधिनियम का मुख्य उद्देश्य परिवारों को जोड़ने और विवादों को सौहार्दपूर्ण ढंग से सुलझाने का होता है।
* **लिखित बयान (Written Statement - WS):** विपक्षी पक्ष कोर्ट में उपस्थित होकर याचिका का अपना लिखित जवाब दाखिल करता है।
* **काउंसलिंग/मध्यस्थता (Mandatory Counseling/Mediation):** सुनवाई आगे बढ़ाने से पहले कोर्ट दोनों पक्षों को **काउंसलर या मीडिएशन सेंटर** भेजती है।
* यदि समझौता हो जाता है, तो समझौते की शर्तों के आधार पर केस का निस्तारण कर दिया जाता है।
* यदि मध्यस्थता विफल (Failed) हो जाती है, तो काउंसलर इसकी रिपोर्ट कोर्ट को भेजता है और मामला आगे बढ़ता है।
# # 3. मुद्दों का निर्धारण और अंतरिम आदेश (Framing of Issues & Interim Orders)
* **अंतरिम आवेदन (Interim Applications):** मुख्य केस के लंबित रहने के दौरान यदि भरण-पोषण (Interim Maintenance) या बच्चों से मिलने की अनुमति (Child Visitation) की आवश्यकता हो, तो कोर्ट इस चरण में अंतरिम आदेश जारी करती है।
* **इश्यूज तय करना (Framing of Issues):** दोनों पक्षों की याचिकाओं और जवाबों को देखने के बाद न्यायाधीश यह तय करते हैं कि विवाद के मुख्य बिंदु (Issues) क्या हैं, जिन पर निर्णय लिया जाना है।
# # 4. साक्ष्य/गवाही की प्रक्रिया (Evidence Phase)
यह केस का सबसे महत्वपूर्ण और विस्तृत चरण होता है, जहाँ दोनों पक्षों को अपने दावों को साबित करना होता है।
* **याचिकाकर्ता की साक्ष्य (Petitioner's Evidence):** मुख्य पक्षकार और उसके गवाह अपने शपथ पत्र (Chief Examination) जमा करते हैं, जिसके बाद विपक्षी वकील द्वारा उनका **क्रॉस-एग्जामिनेशन (Cross-Examination/जिराह)** किया जाता है।
* **विपक्षी की साक्ष्य (Respondent's Evidence):** इसके बाद विपक्षी पक्ष और उसके गवाहों की गवाही तथा क्रॉस-एग्जामिनेशन होता है।
* **दस्तावेजी साक्ष्य:** इस दौरान कॉल रिकॉर्ड, बैंक स्टेटमेंट या अन्य आवश्यक साक्ष्य प्रदर्शित (Exhibit) कराए जाते हैं।
# # 5. बहस और अंतिम फैसला (Final Arguments & Judgment)
* **अंतिम बहस (Final Arguments):** दोनों पक्षों के वकील कोर्ट के सामने पूरे केस, साक्ष्यों और प्रासंगिक कानूनी नजीरों (Judgments/Precedents) के आधार पर अपनी-अपनी दलीलें रखते हैं।
* **फैसला/डिग्री (Judgment & Decree):** सभी साक्ष्यों और बहसों का मूल्यांकन करने के बाद पारिवारिक न्यायालय अपना अंतिम निर्णय (जैसे तलाक की डिग्री, भरण-पोषण की राशि का अंतिम निर्धारण आदि) सुनाती है।
> **ध्यान दें:** यदि कोई पक्ष पारिवारिक न्यायालय के अंतिम फैसले या आदेश से असंतुष्ट होता है, तो वह नियमानुसार संबंधित **उच्च न्यायालय (High Court)** में अपील दाखिल कर सकता है।

#
>

12/07/2026

बाहर वाले के कारण अपनी गृहस्थी नहीं बिगाड़े | इस वीडियो से सबक लेना चाहिए !!

12/07/2026

क्या आप जानते हैं !!

**धारा 274 BNS-- बिक्री के लिए इच्छित भोजन या पेय में मिलावट।**

जो कोई खाने या पीने की किसी वस्तू में मिलावट करता है ताकि ऐसी वस्तु को खाद्य या पेय के रूप में हानिकारक बनाया जा सके, ऐसी वस्त् को खाद्य या पेय के रूप में बेचने का इरादा रखता है, या यह जानते हुए कि उसे खाद्य या पेय के रूप में बेचा जाएगा, उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास की सजा दी जाएगी जिसे छह महीने तक बढाया जा सकता है, या जुर्माना जो पांच हजार रुपये तक बढ़ाया जा सकता है, या दोनों से दंडित किया जाएगा।

हिंदू कानून के तहत नोटरीकृत तलाक या विवाह समझोते की कोई कानूनी वैधता नहीं- मध्य प्रदेश उच्च न्यायालयहिन्दू विवाह अधिनियम...
08/07/2026

हिंदू कानून के तहत नोटरीकृत तलाक या विवाह समझोते की कोई कानूनी वैधता नहीं- मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय

हिन्दू विवाह अधिनियम, 1955 पर न्यायालय का निष्कर्ष--

उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया कि हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत, एक हिंद्र विवाह को केवल सक्षम न्यायालय द्वारा पारित डिक्री के माध्यम से ही समाप्त किया ज सकता है। अदालत ने कहा कि केवल नोटरीकत तलाक समझौते को निष्पादित करने में कानून की शक्ति नहीं है और वैध हिंदू विवाह को कानूनी रूप से समाप्त नहीं किया जा सकता है। डसलिए. अदालती डिक्री के अभाव में, पहली शादी कानर्न रूप से वैध बनी रही।

नोटरीकृत विवाह समझौते पर न्यायालय का निष्कर्ष--

अदालत ने आगे स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह किसी निजी अनुबंध के माध्यम से नहीं बनाया जाता है। यह देखा गया कि नोटरीकत विवाह समझौता अपने आप में हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत कानूनी रूप से वैध विवाह नहीं बना सकता है। पीठ ने कहा कि हिंदू कानून के तहत विवाह वैधानिक प्रावधानों और कानूनी आवश्यकताओं द्वारा शासित होता है और इसे केवल नोटरीकृत समझौते पर हस्ताक्षर करके स्थापित नहीं किया जा सकता है।

मामला संख्या: 2026 की रिट अपील संख्या 1624

अपीलकर्ता बनाम प्रतिवादी: राम कपाल सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य और अन्य

#तलाकयाचिका #भरणपोषण #पति #पारिवारिकन्यायालय #धारा125 #आपराधिक ‎⁨
divorcelawyersjaipur.com

07/07/2026

पति द्वारा पत्नी पर पैतृक संपत्तिमें हिस्सा मांगने का दबाव दहेज की मांग माना जा सकता है: कलकत्ता उच्च न्यायालय

मामला संख्याः सीआरए (डीबी) 2024 का 183 (2017 के सीआरए 538 के साथ)

अपीलकर्ता बनाम प्रतिवादी: सजल पारुई बनाम पश्चिम
बगाल राज्य

Address

Rajasthan High Court
Jaipur
302016

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when क़ानूनी सलाह posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Shortcuts

Share