Vedic Legal Firm

  • Home
  • Vedic Legal Firm

Vedic Legal Firm it provide the legal remedy and legal advice to the common people. Type lawforcommon on facebook and

आज सुबह सुबह भस्म आरती महाकालेश्वर शिव के दरबार में!!उसके बाद काल भैरव दर्शन!!
18/09/2023

आज सुबह सुबह भस्म आरती महाकालेश्वर शिव के दरबार में!!
उसके बाद काल भैरव दर्शन!!

28/06/2020

Which is correct representation about Constitution-
1- Constitution of India 1947
2- Constitution of India 1949
3- Constitution of India 1950
4- Constitution of India 1935

28/06/2019

#आपराधिक या #आधिकारिक शैली
अभी कुछ दिनों पहले रामपुर मे एक रेप के आरोपी को कथित तौर पर वहाँ के एसपी अजयपाल शर्मा के द्वारा गोली मार दी गयी जिसकी प्रशंसा उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे देश मे मीडिया व सोशल मीडिया के द्वारा की गयी ।
इस घटना मे कितनी सच्चाई है ये आने वाला समय बताएगा पर इस घटना को जिस तरीके से जनता और मीडिया ने एक स्वर्णिम और नूतन युग की तरह पेश किया उस पर समाज के नेताओं ,बुद्धिजीवियों ,न्यायपालिका व विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं को ध्यान देने व विचार करने की जरूरत है ।
जनता के व्यवहार ने ये साबित कर दिया की इस तरीके के निर्णय का वो खुले दिल से स्वागत करती है, और करे भी क्यों नहीं?? बार बार अपने पैसे और पावर के दम पर किसी भी आपराधिक गतिविधि को उसकी प्रारम्भिक अवस्था मे दबा दिया जाता है या कोर्ट मे प्रशासन द्वारा चार्जशीट मे देरी कर उसके सबूतों को कभी आर्थिक तो कभी राजनीतिक कारणों से, प्रशासन की मिलीभगत से मिटा दिया जाता है या फिर कोर्ट की लचर व्यवस्था के कारण निर्णय बहुत देर से आता है या सबूतों के अभाव मे ऐसे लोग छूट जाते हैं ।
दूसरा पक्ष ये है की क्या किसी भी व्यक्ति को बिना किसी समुचित ट्रायल के सिर्फ इस आधार पर की किसी दूसरे महिला या व्यक्ति द्वारा किसी मामले मे आरोपित किया गया है उसे गोली मार दिया जाना चाहिए??क्या इस देश के संविधान को किसी व्यक्ति की अपनी समझ से छोटा आँका जाना चाहिए ??क्या इस देश के नियम कानून महत्वहीन हो गए हैं और पुलिस महकमा सभी नियम कानून से ऊपर हो गया है ?? लग तो ऐसा ही रहा ,पर एक बात है निर्णय तो हुआ, और वो भी सबसे जल्दी ,इससे जल्दी शायद कहीं निर्णय नहीं होता होगा ।अब निर्णय सही है या गलत इसकी कोई गारंटी नहीं है और न ही कभी हो सकती है अर्थात गलती भले ही किसी और ने की हो पर सजा किसी और को भी मिल सकती है या भले ही आपने गलती न की हो पर सजा आपको मिल सकती है और इसमे कोई अचंभा होने वाली बात भी नहीं है क्योकि देश मे ऐसे कानून हैं जहां आपने गलती की हो या न की हो सजा आपको दी जाती है । (एससी एसटी एक्ट )खैर अभी तक इस तरीके की गोली मारने की सजा को संवैधानिक या विधिक संरक्षण नहीं मिला हुआ है ।
एक मिनट के लिए अगर हम इस कार्यशैली को सही मान ले तो एक बात सुनिश्चित होता है की प्रशासन पर किसी भी अतिवादी तत्वों का कोइ दबाव नहीं है ,पर क्या इससे जनता की समस्या का समाधान हो जाएगा ?? जनता का शोषण रुक जाएगा ??मेरा मानना है ‘नहीं’
क्योंकि इससे ऐसा तबका जो आपराधिक घटनाओं के लिए जिम्मेदार है उसके अंदर डर तो पैदा होगा पर इस डर को पैदा करने वाली सरकारी मशीनरी जनता का खुद शोषण नहीं करेगी इसकी कोई गारंटी नहीं है और अगर बीते अनुभवों को स्मरण करें तो अराजक तत्वों से जिस पुलिस महकमे ने आम जनता की हमेशा सुरक्षा प्रदान की है उसी महकमे मे बैठे आपको हजारों की संख्या मे लोग मिल जाएंगे जिन्होने वाहवाही के लिए खूब फर्जी एनकाउंटर (निर्दोष लोगों के ) किए हैं या फिर अपने आराध्य नेता के लिए आम लोगों का जीना दुर्भर किया है या फिर जनता के दबाव मे या मामले की त्वरित कारवाई के चक्कर मे बेगुनाह लोगों के खिलाफ षणयंत्र रच कर उन्हे फसाने की कोशिश की है या फिर एक पक्ष से आर्थिक लाभ लेकर दूसरे निर्दोष पक्ष को डराने धमकाने व उनका शोषण करने का कार्य किया है ।
इस तरीके के दमनकारी पुलिस के हजारों उदाहरण मिल जाएंगे जैसे लखनऊ मे एक घटना बहुत बड़े स्तर पर उठी थी जिस समय लखनऊ के एसएसपी यशस्वी यादव हुआ करते थे ,एक लड़की की हत्या की गयी फिर उसे छोटे छोटे टुकड़ों मे काट कर बैग मे बांधकर फेक दिया गया था ,इस घटना पर मीडिया और सोशल मीडिया दोनों पर ही लोगों ने ज़ोर शोर से रोष प्रकट किया, लोगों का गुस्सा जब सातवें आसमान पर था तो उसे ठंडा करने के लिए उस लड़की के पुराने पुरुष रोहित (शायद यही नाम ) को गिरफ्तार किया गया जो ग्यारहवीं मे पढ़ने वाला छात्र था,कहानी पुलिस ने ये बनाई की इन दोनों के ब्रेकअप हो जाने से लड़का बहुत परेशान था और इसलिए उसने इसकी हत्या कर दी ,वो लड़का मीडिया और सोशल मीडिया पर रातों रात भारत का सबसे बड़ा विलेन हो गया और उसे छोड़िए उसके माता पिता के बारे मे और उनके दिये संस्कारों को जो भला बुरा कहा गया जो शायद वो कभी न भूल पाएँ ।
हद तो तब हो गयी जब पुलिस ने एक आरी दिखाई जिससे उस लड़की को काटने का दावा किया गया और इसके लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री जी ने एसएसपी साहब को शाबासी दे दी ।
घटना मे ट्विस्ट तब आया जब उस दुकानदार ने हिम्मत दिखाई और मीडिया के सामने आकर उसने बताया की ये आरी पुलिस ने मुझसे खरीदी थी और इस आरी से लकड़ी तो ठीक से कटती नहीं हड्डी कहाँ से कटेगी??
सोचिए अगर दुकानदार सामने नहीं आया होता तो एक नए उम्र के निर्दोष लड़के को कइयों साल जेल मे गुजारना पड़ता और जब वो जेल से निकलता तो उसके पास भी अपराधियों से संबंध होते और रोजी रोटी का सबसे आसान तरीका उसके पास अपराध होता क्योंकि सभ्य समाज तो उसके पास भी जाने से हिचकता स्वीकार करना तो दूर ,और जो लोग इसके गिरफ्तारी के निर्णय का स्वागत कर रहे थे उन्हे इसके अपराधी बनने पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

अभी मुरादाबाद मे एक और घटना आई है जहां सतवीर को पुलिस ने जहीर बनाकर गिरफ्तार किया वो भी गौकशी के जुर्म मे ,आपको जानकर आश्चर्य होगा की सतवीर की माँ बहुत बड़ी गौसेवक हैं और अपने बेटे का पता न चलने पर वो गौमाता से ही अपने पुत्र के सकुशल होने की मांग करती रहीं अर्थात एक गौभक्त को गौकशी मे गिरफ्तार कर उसका शोषण किया गया और उसके नाम तक को बदल दिया गया।
ऐसी असंख्य घटनाएँ मिल जाएंगी जहां प्रशाशन का वीभत्स रूप सामने आया है और कितनी घटनाएँ कभी लोगों के सामने नहीं आयीं इसकी भी कोई गिनती नहीं है ।
अब बात करते है समाधान की ,और इसका एकमात्र उपाय संवैधानिक मशीनरी को ठीक किया जाना है और इसकी ज़िम्मेदारी सरकार और न्यायालय दोनों को लेनी होगी ,एक एडवोकेट होने के नाते बहुत बार मैंने ऐसा महसूस किया है की अगर आज न्यायालय थोड़ी सक्रियता दिखाता तो कुछ और मामले निपट सकते थे और शायद आज के समय लोगों के नजर मे इसीलिए न्यायालय के प्रति सम्मान कम होता जा रहा है ,पर लोगों को यहा समझना होगा की हर न्यायालय मे जजों और अन्य स्टॉप की संख्या निर्धारित संख्या की तुलना मे बहुत कम है ।
दुनिया का कोई भी न्यायालय भारत के न्यायालयों की तुलना मे आधे केस का भी निपटारा नहीं करता और यूरोप और अमेरिका की बात करें तो एक चौथाई से भी कम है ,आज जरूरत है की न्यायालयों मे जजों की संख्या बढ़ाई जाए और पुलिस को बिना किसी राजनीतिक दबाव के काम करने दिया जाए ,और पुलिस द्वारा किए गए किसी भी अतिउत्साह के कार्य पर उनके खिलाफ सख्त एक्शन लिया जाए क्योकि जिसे जो ज़िम्मेदारी दी गयी है बस उसे वो कर ले तो समस्या का समाधान हो जाएगा ।
अन्यथा की कोई भी स्थिति भयावह होगी और हम निर्दोषों की मौतों का भी जश्न मनाने मे मशगूल रहेंगे और मातम सिर्फ तब मनायेंगे जब उनमे से मरने वाला कोई अपना भाई बहन माँ बाप होगा और इस तरीके से हम किसी जानवर से अलग नहीं दिखेंगे।

आदित्य विक्रम शाही
एडवोकेट ,हाई कोर्ट
लखनऊ

15/01/2019

Happy makar Sankranti to all Indian
From vedic legal firm

बहुत दिनों से मेरे कई शुभचितकों तथा मार्गदर्शन करने वाले लोगों द्वारा मुझसे कहा गया कि कुछ मुद्दों पर अपना वीडियो बना कर...
10/01/2019

बहुत दिनों से मेरे कई शुभचितकों तथा मार्गदर्शन करने वाले लोगों द्वारा मुझसे कहा गया कि कुछ मुद्दों पर अपना वीडियो बना कर मै डाला करूं।
इसलिए मैंने संविधान को jaguar defence academy के साथ मिलकर लोगों को सरल शब्दों में समझाने की एक छोटी सी कोशिश की है।
आप लोग अपना विचार, उसमे सुधार तथा अपना आशीर्वाद दें जिससे मै इस श्रृंखला को पूरा कर पाऊं।
https://youtu.be/ME2Ecx1IZr

30/12/2018

Legality of s*xuality(forced) of woman!!
At 16 december 2012 a horrible incident in the capital of India ,delhi, take place in which nirbhaya was r***d and killed brutually. In a country like india whose ancient religious text like veda, upanishada and others, preach the people that respect of the woman is supreme and every woman should be treated as goddess, it is very shameful and big black spot on the india in twenty first century.
After this incident due to public pressure an ordinance was passed by the government.The Ordinance had replaced the offence of ‘r**e’ with that of “s*xual assault” in which both the perpetrator and the victim could be of either s*x. The Act passed by the Parliament reverts to the earlier concept that r**e can be perpetrated only by a man on a woman in the influence of various woman organization . It expands the definition to include pe*******on of private parts by objects etc. It specifies that the penalty for gang r**e would be at least twenty years, and could be life imprisonment (i.e., until the person dies). It also prescribes life imprisonment for repeat offenders, and life imprisonment or death penalty if the victim dies or causes her to be in a persistent vegetative state. It has enhanced penalties for offences committed by those in positions of authority or fiduciary position.
criminal law (amendment) act 2013 popularly known as anti r**e bill.The Act recognizes the broad range of s*xual crimes to which women may fall victim, and a number of ways in which gender based discrimination manifests itself. It also acknowledges that lesser crimes of bodily integrity often escalate to graver ones. It seeks to treat cases as “rarest of the rare” for which courts can award capital punishment if they decide so. The Act clarifies and extends the offense of s*xual assaults or r**e as a result of abuse of position of trust. As per the Act, the police will also be penalized for failing to register FIRs – this will make it easier for r**e victims to report their case.
In the priya patel vs state of M.P honorable high court held” though a woman could not commit r**e, but if a woman facilitated the act of r**e, she could be prosecuted for gang r**e.”
In the same case “ honorable Supreme Court, apparently, had a different view. relaying upon biological facts, construed statutory provision in favour of the woman and held that a woman cannot be charged for gang r**e. The apex court held that, after a reading of Section 375 of the IPC, r**e may be committed only by man. The explanation to Section 376 (2) merely indicates that that when one or more persons act in furtherance of their common intention to r**e a woman, each person of the group must be deemed to have committed gang r**e.
The rule is based on the principle of common intention as provided in section 34 of the IPC. Common Intention denotes acts done in postulation as per a pre arranged plan or in pursuance of prior meeting of minds. When this section is applied to section 376 (2) (g), it may require fulfilment of the common intention which in such a case may be common intention to r**e. Since such intention may not exist with a woman, as given in the definition, a woman may not be held liable for gang r**e as well.
In section 375 the word`man’ was expressly given but in the 376(2) the word` person’ is given.it means legislative is not making any prohibition about man and woman FOR conviction in the case of gang r**e
The above highlighted word” biological fact” and “since such intention may not exist with a woman,as given in the definition” clearly reflect that a woman can not intend to gain s*xual desire with another woman. .it may be also termed as a woman can not be satisfied her s*xual desire with a woman.
After the amendment in section 375 ipc in 2013 a person of common prudence can easily understand that the act for which a man is convicted for r**e can be similarly performed by a female. The matter which was not present is `intention’ of fulfilling the s*xual need of a female by making the activities given in the 375.this requirement is also fulfilled after making le***an s*x legal and by providing a legal status to the le***an marriage.
On the matter of Marriage quran states that “every person must marry”. Quran asserts that marriage is the only way to satisfy one’sdesire. Marriage (nikha) is defined to be a contract which has for its object the procreation and the legalizing of children
Legally, every young person has right to marry and to enter into a marriage contract. But unlike any commercial contract, responsibilities of the contract of marriage are not limited only within the contractual parties. Marriage is the foundation of a family as well as social relations. A couple owes a great responsibility to the family and society. In other words, right to marry is not an absolute one; it has to correspond to some other duties. For example, among the various objectives of a marriage, two prime objectives are to legalize the s*xual in*******se between two persons of opposite s*xes, and to procreate children.
Procreation of the children by the LGBT marriage is not possible without any outside help hence the aim of the LGBT marriage is only the fulfillment of s*xual desire hence it can be easily understand that by the le***an s*x a female can satisfy her desire. if a female is capable to gain the pleasure from a female then it will be hypothetical to state that female will never use the force against a female or not performing the activities given in section 375 of the IPC to satisfy her s*xual desire.
It is clearly reflect that mens rea and actus reus in the offence of r**e can be present in case of female also hence the status of female in respect of section 375 and other s*xual offences should be changed and the forced s*xuality of woman should be treated as crime. If even after the present circumstances this type of s*xual orientation is not treated as crime then it will amount to the violation of article 14 (right to equality)of Indian constitution and gradually society will considered it as surrender of judiciary before the so called woman empowering organization.

ADITYA VIKRAM SHAHI

HIGH COURT ,LUCKNOW

08/11/2018

May this season of lights brighten your world 🌏
Belated

Submitted IA in honerable Supreme Court of india 🇮🇳 to remove article 35a from our constitution.
29/08/2018

Submitted IA in honerable Supreme Court of india 🇮🇳 to remove article 35a from our constitution.

11/08/2018

संवैधानिक या राजनीतिक सर्वोच्चता

माननीय सूप्रीम कोर्ट के आदेश के खिलाफ सरकार द्वारा लाया गया एससी एसटी बिल संविधान के सामने किस हद तक रुकेगा ये भविष्य तय करेगा ,पर एक बात तय है कि संवैधानिक वैध्यता भले सूप्रीम कोर्ट द्वारा बाद मे तय हो पर राजनीतिक वैध्यता सभी दलों के समर्थन के द्वारा तय कर दी गयी है !!
संविधान कि धारा 16 से ये बिल अपनी वैध्यता पाता है ,जो मूलभूत अधिकारों का हिस्सा है ,अब समझना यह होगा कि क्या ये अधिकार दूसरे व्यक्तियों के मूलभूत अधिकारों को प्रभावित तो नहीं कर रहे ??
इसे समझने के लिए माननीय सूप्रीम कोर्ट के द्वारा दिये गए आदेश और बिल दोनों को समझना होगा।
सूप्रीम कोर्ट के अनुसार-
1-किसी भी व्यक्ति (सवर्ण ,पिछड़े ) कि गिरफ्तारी DSP रैंक के अधिकारी के जांच के बाद हो सकेगी ।
2-किसी सरकारी कर्मचारी कि गिरफ्तारी उसके सीनियर के स्वीकृति के बाद हो सकेगी ।
3-किसी भी व्यक्ति को इस एक्ट मे अग्रिम जमानत दी जा सकती है ।

ये फैसला सरकारी कर्मचारियों के द्वारा किए गए एक केस मे आया जिसमे उन्होने आरोप लगाया था कि एससी एसटी क्लास से संबंध रखने वाले सरकारी कर्मचारियों द्वारा उन पर झूठा केस दर्ज किया गया है ।
सूप्रीम कोर्ट के द्वारा दिये गए आदेश को निष्प्रभावी करने के बिल लाया गया और उसके आदेश के मुख्य बिन्दुओं को दरकिनार कर दिया गया ।
तीनों बिन्दुवों पर सरकार का स्टैंड समझते हैं -
1-सरकार का कहना है कि शिकायत मिलते ही तत्काल FIR तथा गिरफ्तारी( बिना किसी जांच के )होगी,इस तरीके से सरकार ने जातिसूचक शब्दों को हत्या और रेप जैसे अपराध कि तरह जघन्य समझने कि बात कि है क्योकि इस तरीके से एफ़आईआर और गिरफ्तारी इसी मे होती है ।
दूसरा पक्ष ये है कि क्या इससे उन व्यक्तियों कि मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं हो रहा जिन्हे अकारण जेल मे डाला जा सकता है ,नियमतः मूलभूत अधिकारों को सिर्फ आपातकाल के समय ही समाप्त किया जा सकता है तो क्या इसे देश के 78% लोग अपने लिए अघोषित आपातकाल ही समझें।
हमारे संविधान के हिसाब से "दस गुनहगार भले ही छुट जाएँ पर एक भी निर्दोष को सजा नहीं दी जा सकती है "
अब ये बिल कितना संविधान सम्मत है आने वाले समय मे माननीय सूप्रीम कोर्ट के आदेशों से ही पता लगेगा ।
2-सरकारी कर्मचारियों के केस मे भी कमोवेश यही तर्क फिट बैठता है।
3-सरकार ने बिल के माध्यम से अग्रिम जमानत पर रोक लगा दी है ,
हमारे देश के कानूनों और सूप्रीम कोर्ट के निर्णयों के तहत "BAIL IS RULE,JAIL IS EXCEPTION" और इस निर्णय से तो सरकार ने एससी एसटी एक्ट को हत्या और दहेज हत्या से भी जघन्य बना दिया क्योकि उनमे अग्रिम जमानत हो सकती है ।
पर एक बात और यहा ध्यान देने योग्य है कि उच्च न्यायालय से रिट के माध्यम से गिरफ्तारी पर रोक लग सकती है अर्थात जिनके पास ठीक ठाक पैसा है और वो उच्च न्यालय जाने मे सक्षम हैं तो वो इस एक्ट कि मार से एक हद तक बच सकते हैं लेकिन जिनके पास पैसा नहीं है या कम है वो लोअर कोर्ट से अग्रिम जमानत नहीं ले सकते हैं,इस तरीके से किसी भी गरीब तबके के लिए ये कैसा साबित होगा ये देखने योग्य होगा ।
इस बिल मे सरकार ने तीनों पर(DSP,HIGH OFFICIALS,SUPREME COURT) भरोसा नहीं दिखाया है अब जनता इन तीनों पर भरोसा दिखाये या सरकार कि विवशता मे अपने आप को भी विवश ही समझ चुप बैठे ।
वर्तमान मे केवल 27% केसेज मे ही न्यायालय मे आरोप साबित हुए हैं,इस पर एक पक्ष ने तीन कारण गिनाए हैं -
1-F.I.R मे लेट होना
2-आरोप लगाने वाले के द्वारा आरोप साबित न कर पाना
3-गवाह का मुकर जाना
वही दूसरे पक्ष का ये कहना है कि आरोप झूठे थे इस लिए न्यायालय मे टिक नहीं पाये ।
अब सरकार कि ये ज़िम्मेदारी है कि कानून बनाते वक़्त ध्यान दे कि किसी भी समुदाय के खिलाफ अन्याय न हो सके,अगर कानून बनाते समय संवैधानिक से ज्यादा राजनीतिक पहलू को ध्यान दिया गया तो न्यायालय मे संवैधानिक समीक्षा के समय ये टिक नहीं पाएंगे ।
दिल्ली महिला आयोग द्वारा 498A(घरेलू हिंसा ) मे तत्काल गिरफ्तारी कि मांग पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि हम आपको किसी भी अन्याय से बचने के लिए ढाल दे सकते हैं पर तलवार नहीं ।
अब देखना दिलचस्प होगा कि इस एक्ट का उपयोग ढाल के तरीके से बचाव मे किया जाता है कि तलवार बनाकर दुरुपयोग किया जाता है ,और क्या सूप्रीम कोर्ट इस कानूनी तलवार को सही मानती है या गलत ??

नोट -इस लेख का उद्देश्य सिर्फ एससी एसटी बिल के बदलावों के कानूनी पहलूवों को समझाना है न की किसी के भावनाओं को ठेस पहुचाना।
द्वारा
अदित्य विक्रम शाही

Address

Vijayant Khand

226028

Opening Hours

Monday 09:00 - 17:00
Tuesday 09:00 - 17:00
Wednesday 09:00 - 17:00
Thursday 09:00 - 17:00
Friday 09:00 - 17:00
Saturday 09:00 - 17:00
Sunday 12:00 - 17:00
18:00 - 19:00

Telephone

7985747802

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Vedic Legal Firm posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Business

Send a message to Vedic Legal Firm:

  • Want your business to be the top-listed Law Practice?

Share