Virender Kasana Advocate Ex Secretary Patiala House Court Bar Association

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Virender Kasana Advocate Ex Secretary Patiala House Court Bar Association Virender Kasana Adv. Ch. No 220 District Court Saket New Delhi
Off. 17/1 Kalkaji New Delhi 9871184444

राजीव गांधी जी भारत के सबसे युवा और दूरदृष्टि वाले प्रधानमंत्रियों में से एक माने जाते हैं। 20 अगस्त 1944 को जन्मे राजीव...
21/05/2026

राजीव गांधी जी भारत के सबसे युवा और दूरदृष्टि वाले प्रधानमंत्रियों में से एक माने जाते हैं। 20 अगस्त 1944 को जन्मे राजीव गांधी शुरुआत में राजनीति से दूर थे तथा एक पेशेवर पायलट के रूप में कार्य करते थे। लेकिन परिवार की परिस्थितियों ने उन्हें सार्वजनिक जीवन में लाया, और 1984 में उन्होंने ऐसे समय देश की बागडोर संभाली जब राष्ट्र अस्थिरता और असुरक्षा के दौर से गुजर रहा था। उनके नेतृत्व में देश ने आधुनिकीकरण की दिशा में एक निर्णायक मोड़ लिया।

मुख्य उपलब्धियाँ व योगदान

1. भारत में तकनीकी क्रांति की शुरुआत
राजीव गांधी को “Modern India Architect” भी कहा जाता है। उन्होंने कंप्यूटरीकरण, सूचना प्रौद्योगिकी और टेलीकॉम सेक्टर को गति दी। STD/PCO का प्रसार, कंप्यूटर शिक्षा को बढ़ावा, सरकारी विभागों में तकनीक का उपयोग—इन सबने आने वाले दशकों में भारत को IT महाशक्ति बनने की नींव प्रदान की।

2. पंचायती राज को संवैधानिक दर्जा देने की पहल
उन्होंने ग्रामीण लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए 73वें और 74वें संशोधन विधेयकों की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य पंचायतों और नगरपालिकाओं को अधिक अधिकार देना था। इन्हीं प्रयासों के आधार पर बाद में स्थानीय स्वशासन की व्यवस्था मजबूत हुई।

3. शिक्षा सुधारों पर विशेष जोर
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (1986) के माध्यम से उन्होंने शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षक प्रशिक्षण, साक्षरता और अनुसंधान पर बड़ा फोकस किया। इसी काल में ‘ऑपरेशन ब्लैकबोर्ड’ जैसी योजनाएँ शुरू हुईं, जो प्राथमिक शिक्षा के सुधार के लिए महत्वपूर्ण कदम थीं।

4. विदेशी नीति में संतुलन और शांति प्रयास
राजीव गांधी ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की सकारात्मक छवि को मजबूत किया। उन्होंने एशिया–प्रशांत क्षेत्र में शांति प्रयासों को बढ़ावा दिया, पड़ोसी देशों से संबंध सुधारने का प्रयास किया और कई शांति समझौतों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

5. युवा और नवाचार को प्रोत्साहन
वे नई पीढ़ी को आगे लाने में विश्वास रखते थे। युवाओं को राजनीति, प्रशासन और तकनीकी क्षेत्रों में अधिक अवसर देने की दिशा में उनका दृष्टिकोण खुला और आधुनिक था।

6. आर्थिक सुधारों के शुरुआती प्रयास
यद्यपि बड़े आर्थिक सुधार 1991 के बाद हुए, लेकिन उसका आधार बनाने का काम राजीव गांधी ने ही शुरू किया—लाइसेंस राज में ढील, उत्पादन बढ़ाने के उपाय, और आयात–निर्यात नीतियों में शुरुआती सुधार उनके ही कार्यकाल में शुरू हुए।

करियर की चुनौतियाँ और विरासत

उनके कार्यकाल में कुछ विवाद भी सामने आए, जिनमें रक्षा सौदों से जुड़े विषयों ने राजनीतिक माहौल को प्रभावित किया। इसके बावजूद देश को तकनीकी रूप से आधुनिक बनाने और प्रशासनिक सुधारों की दिशा में उनके प्रयासों को आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है।
21 मई 1991 को वे एक चुनावी रैली में शहीद हुए, लेकिन उनके सपनों ने भारत को डिजिटल युग में प्रवेश का मार्ग दिखाया और आधुनिक भारत की बुनियाद को मजबूत किया।

हमारे लिए अत्यंत गर्व का अवसर है कि घिटोरनी गाँव, दिल्ली निवासी एवं पटियाला हाउस कोर्ट में वकालत के दौरान मेरे सम्मानित ...
20/05/2026

हमारे लिए अत्यंत गर्व का अवसर है कि घिटोरनी गाँव, दिल्ली निवासी एवं पटियाला हाउस कोर्ट में वकालत के दौरान मेरे सम्मानित साथी रहे आदरणीय श्री जोगिंदर सिंह लोहिया जी, जो रजिस्ट्रार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (दिल्ली) में अपनी सेवाएँ दे रहे थे, अब जज–रजिस्ट्रार, इंडस्ट्रियल कोर्ट, इंदौर (मध्य प्रदेश) के रूप में नियुक्त हुए हैं; ईश्वर से प्रार्थना है कि वे निरंतर प्रगति करते हुए समाज तथा न्याय-व्यवस्था में अपना उत्कृष्ट योगदान देते रहें ,उन्हें हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।

बिपिन चंद्र पाल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अग्रणी नेताओं में से थे जिन्होंने अपने तेजस्वी विचारों, प्रखर लेखनी और प...
20/05/2026

बिपिन चंद्र पाल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन अग्रणी नेताओं में से थे जिन्होंने अपने तेजस्वी विचारों, प्रखर लेखनी और प्रभावशाली वक्तृत्व से पूरे राष्ट्र में स्वतंत्रता की चेतना जगाई। 7 नवंबर 1858 को तत्कालीन असम प्रांत में स्थित सिलहट (अब बांग्लादेश) में जन्मे पाल एक विद्वान बंगाली परिवार से थे। प्रारम्भिक जीवन से ही वे शिक्षा, समाज-चिंतन और राष्ट्रवाद की ओर आकर्षित हुए। उन्होंने शिक्षक और पत्रकार के रूप में कार्य करते हुए भारतीय समाज में फैली कुरीतियों, सामाजिक असमानताओं और ब्रिटिश शासन के अत्याचारों पर खुलकर आवाज उठाई।

भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में बिपिन चंद्र पाल की सबसे बड़ी पहचान लाल–बाल–पाल की त्रिमूर्ति के हिस्से के रूप में है, जिसमें उनके साथ लाला लाजपत राय और बाल गंगाधर तिलक शामिल थे। यह त्रिमूर्ति भारतीय राजनीति में उग्र राष्ट्रवाद के प्रतीक के रूप में जानी जाती है। वे मानते थे कि अंग्रेजों के खिलाफ सिर्फ प्रार्थनाओं और याचिकाओं से स्वतंत्रता प्राप्त नहीं की जा सकती, बल्कि स्वदेशी आंदोलन, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और अपने आत्मसम्मान को जागृत करने से ही असल आज़ादी संभव है। पाल ने ‘स्वराज’ को भारतीयों का जन्मसिद्ध अधिकार बताया और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत किया।

पत्रकारिता और लेखन के क्षेत्र में भी बिपिन चंद्र पाल का योगदान असाधारण रहा। उन्होंने अपने लेखों और भाषणों के माध्यम से जनता को संगठित किया और स्वतंत्रता आंदोलन को गंभीर वैचारिक आधार प्रदान किया। वे सामाजिक सुधार के समर्थक थे और महिलाओं की शिक्षा, सामाजिक समरसता तथा जातिगत भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाते रहे। अपने सिद्धांतों और आदर्शों के प्रति वे इतने दृढ़ थे कि कई बार राजनीतिक मतभेदों के कारण उन्होंने सक्रिय राजनीति से दूरी भी बना ली, लेकिन राष्ट्रहित के प्रति उनकी प्रतिबद्धता जीवनभर बनी रही।

20 मई 1932 को उनका निधन हुआ, लेकिन वे अपने पीछे एक सशक्त वैचारिक विरासत छोड़ गए। आज बिपिन चंद्र पाल को एक महान स्वतंत्रता सेनानी, प्रखर राष्ट्रवादी, दूरदर्शी विचारक और निर्भीक पत्रकार के रूप में याद किया जाता है। उनका योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।

आज अपने गुरु और मार्गदर्शक श्री अजय माकन जी, पूर्व कैबिनेट मंत्री और पूर्व अध्यक्ष दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी व सांसद ...
19/05/2026

आज अपने गुरु और मार्गदर्शक श्री अजय माकन जी, पूर्व कैबिनेट मंत्री और पूर्व अध्यक्ष दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी व सांसद राज्य सभा से मुलाकात की, और हमारी सार्थक बातचीत ने एक बार फिर यह एहसास कराया कि राजनीति कोई अल्पकालिक लक्ष्य नहीं, बल्कि जनसेवा का आजीवन संकल्प है, जहाँ आपकी असली पहचान आपकी पदवी से नहीं बल्कि आपके कार्य, समर्पण और ईमानदारी से बनती है; हर बार जब मैं माकन जी से मिलता हूँ, मुझे उनका आशीर्वाद, मार्गदर्शन और प्रेरणा मिलती है, और मैं हमेशा कुछ नया सीखकर लौटता हूँ—वास्तव में मैं स्वयं को सौभाग्यशाली मानता हूँ कि मुझे अजय माकन जी जैसे गुरु का सान्निध्य प्राप्त है।

यह हमारे लिए बेहद गर्व का क्षण है कि मेरे मित्र ख़ालिद सुजा भडाना सरपंच जी के होनहार बेटे कंवर नहींम ख़ालिद सुजा भड़ाना ...
19/05/2026

यह हमारे लिए बेहद गर्व का क्षण है कि मेरे मित्र ख़ालिद सुजा भडाना सरपंच जी के होनहार बेटे कंवर नहींम ख़ालिद सुजा भड़ाना ने अपनी मेहनत, लगन और जुनून के दम पर अपनी तहसील क्षेत्र का पहला पायलट बनने का अपना सपना पूरा कर लिया है; हिंदुस्तान की सीमा से सटे नचियान गाँव, तहसील करनाह, जिला कुपवाड़ा (जम्मू-कश्मीर) से ताल्लुक रखने वाले ख़ालिद सरपंच जी ने कठिनाइयों और संघर्षों के बीच अपने पुत्र को इस ऊँचाई तक पहुँचाने में जो समर्पण दिखाया है, वह सच में प्रेरणादायक है—कंवर नहींम को इस ऐतिहासिक उपलब्धि पर हार्दिक बधाई और उज्ज्वल भविष्य की अनंत शुभकामनाएँ। 💐✈️

नीलम संजीव रेड्डी जी भारत के छठे राष्ट्रपति, स्वतंत्रता सेनानी और अत्यंत सादगीपूर्ण तथा नैतिक राजनीतिक जीवन के प्रतीक थे...
19/05/2026

नीलम संजीव रेड्डी जी भारत के छठे राष्ट्रपति, स्वतंत्रता सेनानी और अत्यंत सादगीपूर्ण तथा नैतिक राजनीतिक जीवन के प्रतीक थे। उनका जन्म 19 मई 1913 को आंध्र प्रदेश के अनंतपुर ज़िले में हुआ। प्रारम्भिक शिक्षा के दौरान ही उनमें राष्ट्रभक्ति, सामाजिक जागरूकता और न्याय के प्रति गहरी प्रतिबद्धता विकसित हो चुकी थी। युवा अवस्था में ही वे स्वतंत्रता संग्राम की गतिविधियों से जुड़ गए और अंग्रेज़ सरकार के दमन के बावजूद जनसेवा और आंदोलन को प्राथमिकता दी।

स्वतंत्रता संग्राम के दौरान नीलम संजीव रेड्डी जी ने महात्मा गांधी के नेतृत्व में चल रहे आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया। वे भारत छोड़ो आंदोलन और अन्य राष्ट्रीय अभियानों में अग्रिम पंक्ति में शामिल रहे। अंग्रेज़ी शासन के विरोध में उन्होंने अपने अध्ययन और व्यक्तिगत सुविधाओं को त्यागकर पूर्ण समर्पण के साथ देश की आज़ादी के लिए कार्य किया। देश के विभिन्न हिस्सों में जन-जागरण, युवाओं को संगठित करना और ग्रामीण क्षेत्रों में राष्ट्रीय चेतना को बढ़ावा देना उनके प्रमुख योगदानों में शामिल था। उनके नेतृत्व, निष्ठा और साहस ने उन्हें एक विश्वसनीय और सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी के रूप में देशभर में पहचान दिलाई।

आज़ादी के बाद भी राष्ट्र के प्रति उनके समर्पण की लौ लगातार प्रज्वलित रही। वे आंध्र प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री बने, जहाँ उन्होंने प्रशासनिक पारदर्शिता, ग्रामीण उत्थान और शिक्षा के प्रसार को नई दिशा दी। इसके बाद वे दो बार लोकसभा अध्यक्ष बने और संसदीय मर्यादाओं, निष्पक्षता और सुसंस्कृत व्यवहार के लिए प्रसिद्ध हुए। वर्ष 1977 में वे निर्विरोध भारत के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए—जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की एक अनूठी और गौरवपूर्ण उपलब्धि है।

नीलम संजीव रेड्डी जी ने जीवन के प्रत्येक चरण में सादगी, नैतिकता और कर्तव्यपरायणता को सर्वोच्च महत्व दिया। स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान, राष्ट्रनिर्माण में उनकी भूमिका और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने के उनके प्रयास उन्हें सदैव स्मरणीय बनाते हैं। उनका निधन 1 जून 1996 को हुआ, किंतु भारतीय लोकतंत्र में उनके द्वारा स्थापित आदर्श आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करते रहेंगे।

18/05/2026
माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय का हृदय से धन्यवाद एवं आभार, जिन्होंने रोहिणी कोर्ट से जुड़े हालिया प्रकरण पर गंभीरता दिखाते...
18/05/2026

माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय का हृदय से धन्यवाद एवं आभार, जिन्होंने रोहिणी कोर्ट से जुड़े हालिया प्रकरण पर गंभीरता दिखाते हुए त्वरित एवं उपयुक्त प्रशासनिक कदम उठाए। न्यायिक व्यवस्था की गरिमा बनाए रखने के उद्देश्य से न्यायिक अधिकारी राकेश कुमार का स्थानांतरण करते हुए उनसे न्यायिक कार्य वापस लेने का निर्णय निश्चित रूप से एक सराहनीय पहल है।

इस निर्णय से न्यायपालिका की पारदर्शिता, जवाबदेही तथा गरिमा का स्पष्ट संदेश जाता है—कि भविष्य में किसी भी स्तर पर किसी भी न्यायिक अधिकारी का अनुचित आचरण अथवा असहज व्यवहार किसी भी प्रकार स्वीकार्य नहीं होगा। अधिवक्ताओं का सम्मान, उनकी गरिमा और उनकी सुरक्षा सर्वोपरि है; वकालत उससे बाद में आती है।
मान–सम्मान के साथ किसी भी प्रकार का समझौता न आज तक स्वीकार था, न आगे कभी होगा।

एक बार पुनः, माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय का हार्दिक धन्यवाद।

जब अधिवक्ताओं को Officers of the Court माना जाता है, तो न्यायिक परिसर में उन्हें सम्मान और गरिमा मिलना अनिवार्य है। रोहि...
17/05/2026

जब अधिवक्ताओं को Officers of the Court माना जाता है, तो न्यायिक परिसर में उन्हें सम्मान और गरिमा मिलना अनिवार्य है। रोहिणी कोर्ट में कल हुई घटना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण और अस्वीकार्य है, क्योंकि यह इस मूल सिद्धांत के विपरीत है।

बार एसोसिएशन के अध्यक्ष के साथ किया गया व्यवहार न केवल निंदनीय है, बल्कि पूरे अधिवक्ता समुदाय के सम्मान और सुरक्षा पर गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। ऐसी घटनाएँ न्यायपालिका की गरिमा एवं बार–बेंच संबंधों की संतुलित संरचना को गम्भीर रूप से प्रभावित करती हैं।

17/05/2026

जब 1990 में मैंने वकालत शुरू की थी, तब अक्सर एक बात कही जाती थी कि हर अधिवक्ता Officer of the Court होता है। उस समय बार और बेंच का रिश्ता सम्मान, मर्यादा और परस्पर समझ पर आधारित था। अदालतें केवल न्याय का स्थान नहीं थीं, बल्कि एक अनुशासित और गरिमामय परंपरा का प्रतीक थीं।

1995 में, जब मैंने नई दिल्ली बार एसोसिएशन, पटियाला हाउस कोर्ट में एडिशनल सेक्रेटरी का चुनाव जीता और माननीय रमेश गुप्ता जी अध्यक्ष बने, तब वहाँ पैंतीस–छत्तीस न्यायिक अधिकारी कार्यरत थे। उस दौर की सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि वकील और जज—दोनों एक-दूसरे से अत्यंत सम्मान के साथ व्यवहार करते थे।

कभी कोई छोटी घटना भी हो जाती थी, तो जज साहब उसी दिन बार एसोसिएशन के अध्यक्ष या सेक्रेटरी को बुलाकर बात रखते थे। शाम को दोनों पक्ष बैठकर चर्चा करते और विवाद तत्काल समाप्त हो जाता था। न तनाव होता था, न कोई कटुता। यही स्वस्थ Bar–Bench Relationship की असली पहचान थी।

साल 2000 में, जब मैं दोबारा बार एसोसिएशन का सेक्रेटरी बना, तब भी कई छोटी-छोटी बातें आईं, लेकिन समाधान हमेशा संवाद से ही निकला। यह एक ऐसी परंपरा थी जिस पर पटियाला हाउस कोर्ट गर्व करता था।

लेकिन आज परिस्थितियाँ काफी बदल गई हैं।

आज यह देखने में आ रहा है कि कुछ न्यायिक अधिकारी छोटी–छोटी बातों को अनावश्यक रूप से तूल देते हैं, विशेषकर युवा अधिवक्ताओं के साथ कठोर या असम्मानजनक भाषा में बात करते हैं। कई बार ऐसा महसूस होता है कि अदालतों में संवाद और गरिमा की पुरानी परंपरा धीरे–धीरे कमजोर हो रही है।

यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि न्यायिक अधिकारी की पहली जिम्मेदारी है कि वे कोर्टरूम में सम्मान, शांति और संतुलन बनाए रखें। यदि जज स्वयं ऊँची आवाज़ में या धमकी भरे स्वर में बात करेंगे, तो माहौल बिगड़ना स्वाभाविक है।
न्याय का अधिकार उनके पास है—परंतु किसी के सम्मान को ठेस पहुँचाने का अधिकार किसी को नहीं दिया गया।

अधिवक्ता अदालत के अधिकारी हैं, और उनकी गरिमा का संरक्षण न्यायपालिका की गरिमा का ही विस्तार है। यदि बार और बेंच के बीच यह रिश्ता कमजोर पड़ने लगे, तो यह न्याय व्यवस्था के लिए भी हानिकारक है।

कल रोहिणी कोर्ट में हुई घटना इसका एक दुर्भाग्यपूर्ण उदाहरण है।
बार एसोसिएशन के अध्यक्ष के साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, वह अत्यंत निंदनीय और अस्वीकार्य है। यदि शीर्ष पदाधिकारी के साथ ऐसा हो सकता है, तो अन्य अधिवक्ताओं के साथ क्या हो सकता है—यह स्पष्ट संदेश देता है।

ऐसी घटनाएँ न केवल अनुचित हैं, बल्कि संपूर्ण न्यायपालिका की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगाती हैं।

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