Juris Legal Associate

Juris Legal Associate Professional Advocate - Swati Jain

सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी के होटल और कॉल रिकॉर्ड को व्यभिचार के सबूत के तौर पर स्वीकार किया; दिल्ली हाई कोर्ट के 'निजता पूर...
08/07/2026

सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी के होटल और कॉल रिकॉर्ड को व्यभिचार के सबूत के तौर पर स्वीकार किया; दिल्ली हाई कोर्ट के 'निजता पूर्ण नहीं' वाले फैसले को बरकरार रखा।

क्या अब पत्नी कोर्ट के जरिए पति के Hotel Records और Call Detail Records (CDR) निकलवा सकती है?

Case Name: SA v. MA

Case Number: Civil Appeal No. 400 of 2024

Court: Supreme Court of India

हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाई कोर्ट के उस आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें पत्नी को अपने पति के Hotel Records और CDR मंगवाने की अनुमति दी गई थी ताकि वह व्यभिचार (Adultery) के आरोपों को साबित कर सके।

कोर्ट का महत्वपूर्ण संदेशः

यदि ऐसे रिकॉर्ड न्यायपूर्ण निर्णय के लिए आवश्यक और प्रासंगिक हों, तो फैमिली कोर्ट उन्हें मंगवाने पर विचार कर सकती है।

! लेकिन ध्यान रखें:

यह फैसला यह नहीं कहता कि हर वैवाहिक विवाद में पति या पत्नी को दूसरे के निजी रिकॉर्ड स्वतः मिल जाएंगे। प्रत्येक मामले में अदालत तथ्यों, आवश्यकता और कानून के आधार पर निर्णय लेती है।

यह फैसला प्राइवेसी और न्याय के बीच संतुलन स्थापित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

08/07/2026

498a IPC के केस करने की कोई समय अवधि निर्धारित है क्या....??

's wright's
awareness
#कानूनी जानकारी

08/07/2026
"शादी नहीं फिर भी गुजारा भत्ता" — मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने लिव-इन महिलाओं को दी बड़ी राहतलिव-इन रिलेशनशिप को लेकर मध्यप्रद...
08/07/2026

"शादी नहीं फिर भी गुजारा भत्ता" — मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने लिव-इन महिलाओं को दी बड़ी राहत

लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी की तरह साथ रहने वाले जोड़े का ब्रेकअप होने पर भी महिला गुजारा भत्ते की हकदार है, भले ही उसकी वैधानिक शादी होने का कोई साक्ष्य मौजूद न हो। जस्टिस जीएस अहलूवालिया की पीठ ने जिला न्यायालय बालाघाट के गुजारा भत्ता आदेश को बरकरार रखते हुए इसे चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी।

मामले के मुताबिक, बालाघाट निवासी शैलेश बोपचे एक महिला के साथ सालों तक लिव-इन में रहे, जिस दौरान एक बच्चा भी हुआ। बाद में दोनों अलग हो गए तो महिला ने शादी का झांसा देकर पत्नी की तरह रखने का आरोप लगाते हुए बालाघाट कोर्ट में गुजारा भत्ते के लिए आवेदन किया, जिस पर कोर्ट ने पंद्रह सौ रुपये मासिक भत्ता देने का आदेश दिया।

इस आदेश को शैलेश ने हाईकोर्ट में चुनौती दी, लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि लंबे समय तक साथ रहने वाली महिला अलग होने पर भरण-पोषण की हकदार है, भले ही वे कानूनी रूप से विवाहित न हों। इस फैसले से लिव-इन में रह रही महिलाओं के अधिकारों को बड़ी मान्यता मिली है।

"क्या आपको लगता है कि लिव-इन में रहने वाली महिलाओं को भी शादीशुदा महिलाओं जैसे अधिकार मिलने चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं, पोस्ट को शेयर करें और ऐसी ही रोज़ की कानूनी अपडेट्स के लिए हमारा पेज फॉलो करें।"

मेंटेनेंस केस में इलाहाबाद हाइकोर्ट का फेसला
08/07/2026

मेंटेनेंस केस में इलाहाबाद हाइकोर्ट का फेसला

मायके का सहारा लिया तो क्या हुआ? पति की जिम्मेदारी खत्म नहीं: हाईकोर्ट पत्नी को मायके से मदद मिल रही थी, इसलिए पति ने कह...
07/07/2026

मायके का सहारा लिया तो क्या हुआ? पति की जिम्मेदारी खत्म नहीं: हाईकोर्ट

पत्नी को मायके से मदद मिल रही थी, इसलिए पति ने कहा — मुझे मेंटेनेंस नहीं देना! हाईकोर्ट ने कहा — गलत!

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साफ किया कि पत्नी को शादी में परेशानी के दौरान अगर उसके माता-पिता आर्थिक मदद करते हैं, तो यह अस्थायी सहारा है — इससे पति की कानूनी जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती।

जस्टिस गरिमा प्रसाद ने बुलंदशहर फैमिली कोर्ट के आदेश को पलटते हुए यह टिप्पणी की। महिला ने धारा-125 सीआरपीसी के तहत मेंटेनेंस मांगी थी, आरोप था कि शादी के बाद पति और ससुराल वालों ने उसे प्रताड़ित किया, और जनवरी 2020 में उसे बच्चों समेत घर से मारपीट कर निकाल दिया गया।

फैमिली कोर्ट ने पहले महिला की मेंटेनेंस अर्जी पूरी तरह खारिज कर दी थी और सिर्फ दोनों बच्चों को ₹3,000 प्रति माह देने का आदेश दिया था — यह मानते हुए कि महिला बिना उचित कारण अलग रह रही है।

हाई कोर्ट ने कहा — पत्नी के माता-पिता की आय को उसकी अपनी आय नहीं माना जा सकता, और मायके की मदद पति के कानूनी दायित्व की जगह नहीं ले सकती। कोर्ट ने बच्चों की ₹3,000 की राशि को भी 'पूरी तरह अपर्याप्त' बताया।

कोर्ट ने आदेश दिया — पति अब पत्नी को ₹5,000 और हर बच्चे को ₹4,000 प्रति माह देगा।

एक बार किसी ने गौतम बुद्ध से पूछा, "यदि कोई हमें बुरा कहे या हमारा अपमान करे, तो हमें क्या करना चाहिए?" बुद्ध मुस्कुराए ...
07/07/2026

एक बार किसी ने गौतम बुद्ध से पूछा, "यदि कोई हमें बुरा कहे या हमारा अपमान करे, तो हमें क्या करना चाहिए?" बुद्ध मुस्कुराए और बोले, "यदि कोई व्यक्ति आपको कोई वस्तु उपहार में दे और आप उसे स्वीकार ही न करें, तो वह वस्तु किसके पास रहेगी?" उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, "देने वाले के पास।" तब बुद्ध ने कहा, "ठीक उसी प्रकार, यदि कोई आपको कटु वचन, अपमान या द्वेष देता है और आप उसे अपने मन में स्वीकार नहीं करते, तो वे सब उसी व्यक्ति के पास लौट जाते हैं।"
जीवन का यही गहरा सत्य है कि दूसरों के कटु शब्द हमारे मन को तभी चोट पहुँचाते हैं, जब हम उन्हें अपने भीतर स्थान दे देते हैं। इसलिए हर आलोचना का उत्तर देना आवश्यक नहीं होता। धैर्य, संयम और मौन कई बार सबसे प्रभावशाली उत्तर बन जाते हैं। क्योंकि बुरे शब्द और बुरे कर्म अंततः उसी व्यक्ति के पास लौटते हैं जिसने उन्हें जन्म दिया है, जबकि सज्जन व्यक्ति अपने अच्छे संस्कार, शांति और श्रेष्ठ आचरण से ही अपनी पहचान बनाता है। 🙏🙏

महिलाओं के प्रजनन अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 13 सप्ताह तक की गर्भावस्था सम...
07/07/2026

महिलाओं के प्रजनन अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 13 सप्ताह तक की गर्भावस्था समाप्त कराने का अंतिम निर्णय महिला का है और इसके लिए पति की सहमति कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं है।

अदालत ने कहा कि किसी महिला का अपने शरीर, स्वास्थ्य और प्रजनन संबंधी निर्णयों पर अधिकार उसके मौलिक अधिकारों का हिस्सा है। गर्भावस्था जारी रखना या चिकित्सकीय नियमों के अनुसार उसे समाप्त कराना महिला का व्यक्तिगत निर्णय है। ऐसे मामलों में पति की असहमति मात्र के आधार पर महिला को उसके वैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि चिकित्सकीय गर्भसमापन केवल मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) अधिनियम, 1971 तथा उसके तहत निर्धारित शर्तों और योग्य चिकित्सकों की राय के अनुरूप ही किया जाएगा। प्रत्येक मामले में महिला के स्वास्थ्य, गर्भावस्था की अवधि और कानून में निर्धारित मानकों का पालन आवश्यक रहेगा।

यह फैसला महिलाओं की शारीरिक स्वायत्तता, गरिमा और प्रजनन अधिकारों की संवैधानिक सुरक्षा को रेखांकित करता है तथा स्पष्ट करता है कि वैधानिक शर्तें पूरी होने पर पति की सहमति गर्भसमापन की अनिवार्य शर्त नहीं है।
#महिलाअधिकार #प्रजननअधिकार #हाईकोर्ट #एमटीपीअधिनियम

07/07/2026

पति मेंटेनेंस देने से इंकार करें तो पत्नी क्या कर सकतीं हैं...?? #मेंटेनेंस
#कानूनी जानकारी
#सविधान
's wright's
https://youtube.com/?si=BXndQUEUvkunylyH

सुनी हुई बातों पर तुरंत विश्वास नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें विवेक, धैर्य और सत्य की कसौटी पर परखना चाहिए। अधिकांश लोग ...
06/07/2026

सुनी हुई बातों पर तुरंत विश्वास नहीं करना चाहिए, बल्कि उन्हें विवेक, धैर्य और सत्य की कसौटी पर परखना चाहिए। अधिकांश लोग किसी घटना का वही पक्ष बताते हैं, जिससे वे स्वयं सही और दूसरा व्यक्ति गलत दिखाई दे। अपनी भूलों और कमियों का उल्लेख बहुत कम लोग करते हैं। इसलिए किसी के बारे में केवल एक पक्ष सुनकर निर्णय लेना न्याय नहीं, बल्कि जल्दबाज़ी है। परिपक्व व्यक्ति वही है जो हर बात को समझने का प्रयास करता है, दोनों पक्षों को सुनता है और फिर निष्पक्ष होकर निर्णय लेता है। क्योंकि सत्य अक्सर एकतरफ़ा नहीं होता, और न्यायपूर्ण सोच ही अच्छे चरित्र तथा श्रेष्ठ समाज की पहचान होती है। 🙏🙏
जय जिनेंद्र

Address

E22 Ganpati Enclave
Bhopal
462042

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Juris Legal Associate posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share