02/05/2026
📌 सर्वोच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि न्यायिक मजिस्ट्रेट को CrPC की धारा 156 (3) के तहत FIR दर्ज करने का निर्देश देने के लिए सरकार से पहले से मंजूरी लेने की आवश्यकता नहीं है।
✅ यह फैसला जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने सुनाया।
✅ इस मामले में CPI(M) नेता वृंदा करात ने 2020 दिल्ली दंगों से पहले दिए गए कथित भड़काऊ भाषणों को लेकर कुछ नेताओं के खिलाफ FIR दर्ज कराने की मांग की थी। निचली अदालत और दिल्ली हाईकोर्ट ने यह कहते हुए उनकी याचिका खारिज कर दी थी कि ऐसे मामलों में पहले से मंजूरी लेना ज़रूरी है।
✅ हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने इस दृष्टिकोण को गलत ठहराते हुए साफ कहा कि CrPC की धारा 196 और 197 के तहत मंजूरी की आवश्यकता केवल उस चरण पर लागू होती है जब अदालत किसी मामले का संज्ञान लेती है, न कि उस शुरुआती चरण पर जब FIR दर्ज करने या जांच शुरू करने का निर्देश दिया जाता है।
✅ कोर्ट ने यह भी दोहराया कि यदि किसी संज्ञेय अपराध की जानकारी मिलती है तो FIR दर्ज करना पुलिस का अनिवार्य कर्तव्य है, जैसा कि पहले ललिता कुमारी केस में तय किया जा चुका है। यदि पुलिस FIR दर्ज नहीं करती, तो कानून में पहले से ही प्रभावी उपाय मौजूद हैं-जैसे वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से संपर्क करना, मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन देना या सीधे शिकायत दायर करना।इस फैसले के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मौजूदा कानून भड़काऊ भाषण और घृणा अपराधों से निपटने के लिए पर्याप्त है, और नए दिशानिर्देश बनाने की आवश्यकता फिलहाल नहीं है। साथ ही, कोर्ट ने यह जिम्मेदारी विधायिका पर छोड़ी कि यदि आवश्यक हो तो वे इस विषय पर आगे विचार कर सकते हैं।
✅ यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट और प्रभावी बनाता है तथा पीड़ितों को राहत दिलाने के रास्ते को आसान करता है।
📌 ऐसी ही अपडेट्स के लिए हमारे पेज को ज़रूर फॉलो करें और इस पोस्ट को शेयर करें।
BreakingNews