Advocate Vivek Pal Tiger

Advocate Vivek Pal Tiger अधिवक्ता उच्च न्यायालय, इलाहाबाद, अधिवक्ता , उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ।
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105-YEAR-OLD LIFE CONVICT GETS PREMATURE RELEASE🇮🇳 SUPREME COURT ORDERS RELEASE OF 105-YEAR-OLD PRISONERThe Supreme Cour...
22/08/2026

105-YEAR-OLD LIFE CONVICT GETS PREMATURE RELEASE

🇮🇳 SUPREME COURT ORDERS RELEASE OF 105-YEAR-OLD PRISONER

The Supreme Court has ordered the premature release of 105-year-old Rasik Chandra Mandal, who was convicted in a 1988 murder case.

⚖️ WHAT THE COURT SAID

The Bench comprising Chief Justice of India Surya Kant, Justice Joymalya Bagchi and Justice V. Mohana held that, considering Mandal’s advanced age, there was no justification for denying him premature release merely because he had not completed the entire sentence.

📌 CASE BACKGROUND

• Arrested in a murder case registered in 1988.
• Convicted under Section 302 IPC on December 12, 1994.
• His appeal before the Calcutta High Court was dismissed in 2018.
• He approached the Supreme Court at the age of 99 in 2020, seeking premature release.
• In 2024, the Supreme Court granted him interim bail/parole, subject to conditions.
• At 105 years of age, the Court has now ordered his Premature Release.

🔥 KEY TAKEAWAY

AGE AND HUMANITARIAN CONSIDERATIONS MATTER IN PREMATURE RELEASE

The Supreme Court has emphasised that the advanced age of a convict can be a significant consideration while deciding whether continued incarceration is justified.

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. क्या है पूरा मामला?स्थान व समय: उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के इकौना थाना क्षेत्र में मई 2025 (लगभग 12 मई) की रात क...
21/08/2026

. क्या है पूरा मामला?

स्थान व समय: उत्तर प्रदेश के श्रावस्ती जिले के इकौना थाना क्षेत्र में मई 2025 (लगभग 12 मई) की रात करीब 11 बजे।

आरोपी: छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन (36 वर्षीय)। उस पर एक नाबालिग लड़की के अपहरण/दुष्कर्म का आरोप था।

पुलिस का दावा: आरोपी ई-रिक्शा पर नेपाल भागने की कोशिश कर रहा था। 23 पुलिसकर्मियों (जिसमें SWAT टीम भी शामिल) ने उसे घेर लिया। आरोपी ने देसी कट्टा से फायरिंग की। जवाबी कार्रवाई में तत्कालीन SHO अश्विनी कुमार दुबे ने 15 मीटर की दूरी से 9mm सर्विस पिस्टल से दो गोलियां चलाईं, जो सीधे आरोपी के दोनों पैरों में लगीं। कोई पुलिसकर्मी घायल नहीं हुआ।

आरोपी को “हाफ एनकाउंटर” में घायल बताकर गिरफ्तार किया गया। बाद में मुख्य मामले में उसे उम्रकैद की सजा भी हो गई।

2. हाईकोर्ट ने क्या सवाल उठाए?

जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की लखनऊ बेंच ने 13 अगस्त 2026 के आदेश में पुलिस कहानी को prima facie झूठी बताया और कई विसंगतियां गिनाईं:

रात का अंधेरा + 15 मीटर दूरी: सिर्फ हथियार लोड होने की आवाज सुनकर दोनों गोलियां कैसे सटीक दोनों पैरों में लग गईं? क्या SHO का निशाना इतना सटीक था?

23 पुलिसकर्मी vs एक आरोपी: इतनी बड़ी टीम के बावजूद आरोपी फायरिंग कैसे कर पाया? किसी पुलिसकर्मी की वर्दी को एक छर्रा तक क्यों नहीं लगा?

एक जीप में 13 लोग: पुलिस FIR में 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी वाहन में गश्त पर दिखाए गए — यह कैसे संभव?

हर बार पैर में गोली: कोर्ट ने सामान्य टिप्पणी की — “दिन-रात हम देखते हैं कि पुलिस एक गोली चलाती है और वह सीधे आरोपी के घुटने या उसके नीचे लग जाती है। पुलिसकर्मियों को कुछ नहीं लगता।”

कोर्ट का आदेश

पूरे मामले की CBI जांच के आदेश।

CBI को निर्देश: तत्कालीन SHO अश्विनी कुमार दुबे की निशानेबाजी और शूटिंग क्षमता का भी परीक्षण करे — क्या वह रात में 15 मीटर से सिर्फ आवाज सुनकर सटीक निशाना लगा सकता था?

जांच रिपोर्ट 3 महीने में पेश करने को कहा।

FIR में गंभीर विसंगतियां पाई गईं और SHO ने कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश की, ऐसा कोर्ट ने माना।

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सुप्रीम कोर्ट ने Civil Judge (Junior Division) की सीधी भर्ती के लिए पहले लागू 3 साल की अनिवार्य Bar Practice को भविष्य क...
21/08/2026

सुप्रीम कोर्ट ने Civil Judge (Junior Division) की सीधी भर्ती के लिए पहले लागू 3 साल की अनिवार्य Bar Practice को भविष्य की भर्तियों के लिए 1 साल कर दिया है।

1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं में कम-से-कम 1 साल की सक्रिय वकालत आवश्यक होगी।

संक्रमण अवधि में कुछ अभ्यर्थियों को 31 मार्च 2027 तक विशेष राहत दी गई है। चयन के बाद 1 साल Judicial Academy Training और उसके बाद 1 साल structured clerkship की व्यवस्था रखी गई है।

यानी सुप्रीम कोर्ट ने practical experience की आवश्यकता खत्म नहीं की, बल्कि 3 साल की pre-recruitment practice को घटाकर 1 साल किया है और बाकी अनुभव के लिए training/clerkship का प्रावधान किया है।

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21/08/2026

पुलिस FIR दर्ज न करे तो क्या करें? | BNSS धारा 173(4) | FIR का पूरा कानूनी रास्ता....

अगर पुलिस आपकी FIR दर्ज करने से मना कर दे, तो घबराने की जरूरत नहीं है। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में ऐसी स्थिति के लिए कानूनी उपाय दिए गए हैं।
इस वीडियो में जानिए:
✅ थाना FIR दर्ज न करे तो क्या करें?
✅ SP को शिकायत कैसे करें?
✅ BNSS धारा 173(4) क्या कहती है?
✅ Magistrate के समक्ष कब जा सकते हैं?
✅ शिकायत और सबूत सुरक्षित रखना क्यों जरूरी है?
⚖️ कानूनी जानकारी के लिए वीडियो को पूरा देखें और शेयर करें।

⚠️ यह वीडियो सामान्य कानूनी जानकारी के लिए है। किसी विशेष मामले में योग्य अधिवक्ता से कानूनी सलाह लें।

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LawInIndia IndianLaw LegalRights कानून पुलिस FIR BNSS173

सुप्रीम कोर्ट ने RPF और RPSF में कॉन्स्टेबल पद पर कार्यरत उन कर्मचारियों की बर्खास्तगी को सही ठहराया है, जिन्होंने भर्ती...
20/08/2026

सुप्रीम कोर्ट ने RPF और RPSF में कॉन्स्टेबल पद पर कार्यरत उन कर्मचारियों की बर्खास्तगी को सही ठहराया है, जिन्होंने भर्ती प्रक्रिया के दौरान अपने खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की जानकारी छिपाई थी।

यह फैसला जस्टिस पमिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने सुनाया। उम्मीदवारों ने भर्ती परीक्षा, फिजिकल और क्षमता परीक्षण पास किया था तथा चयनित होकर ट्रेनिंग भी शुरू कर दी थी। हालांकि, डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन और मेडिकल प्रक्रिया के दौरान उन्होंने अपने खिलाफ चल रहे आपराधिक मामलों का खुलासा नहीं किया। बाद में जब अधिकारियों को इन मामलों की जानकारी मिली, तो वर्ष 2015 में उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भर्ती प्रक्रिया में उम्मीदवार से मांगी गई जानकारी पूरी और सही होना आवश्यक है। आपराधिक मामलों को जानबूझकर छिपाना केवल एक सामान्य गलती नहीं है, बल्कि यह उम्मीदवार के चरित्र और उसकी नियुक्ति की उपयुक्तता से जुड़ा महत्वपूर्ण तथ्य है। RPF के लागू नियमों में ऐसी जानकारी छिपाने पर नियुक्ति रद्द करने या सेवा से हटाने का प्रावधान है।

कोर्ट ने Avtar Singh v. Union of India, (2016) 8 SCC 471 के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि कई लंबित आपराधिक मामलों को जानबूझकर छिपाने की स्थिति में नियोक्ता द्वारा उम्मीदवारी रद्द करना या नौकरी से हटाना उचित हो सकता है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि बाद में किसी आपराधिक मामले में बरी हो जाना हर परिस्थिति में नौकरी में बहाली का स्वतः अधिकार नहीं देता। वर्तमान मामले के तथ्य उन मामलों से अलग थे, जहां उम्मीदवार नियुक्ति से पहले ही बरी हो चुका था या कर्मचारी लंबे समय तक सेवा कर चुका था।

📌Case Title: Bappa Barai Versus Union of India & Ors. (with connected cases)

इस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने बर्खास्तगी को चुनौती देने वाली अपीलों को खारिज कर दिया और स्पष्ट संदेश दिया कि सरकारी नौकरी की भर्ती प्रक्रिया में आपराधिक मामलों से जुड़ी जानकारी जानबूझकर छिपाना कर्मचारी को गंभीर सेवा संबंधी परिणामों का सामना करा सकता है।

💬 आप सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को सही मानते हैं? अपनी राय कमेंट में जरूर बताएं।

ऐसी ही महत्वपूर्ण कानूनी और सरकारी नौकरी से जुड़ी अपडेट्स के लिए हमारे पेज को ज़रूर फॉलो करें और इस पोस्ट को शेयर करें।

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#अनुच्छेद32 #मौलिकअधिकार #संवैधानिकउपचार

अनुच्छेद 32 — संवैधानिक उपचार का अधिकार ⚖️मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर व्यक्ति सीधे सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है।सुप्रीम...
20/08/2026

अनुच्छेद 32 — संवैधानिक उपचार का अधिकार ⚖️

मौलिक अधिकारों के उल्लंघन पर व्यक्ति सीधे सर्वोच्च न्यायालय जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट को Habeas Corpus, Mandamus, Prohibition, Certiorari और Quo Warranto जैसी रिट जारी करने की शक्ति प्राप्त है।

डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा था।

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#अनुच्छेद32 #मौलिकअधिकार #संवैधानिकउपचार

20/08/2026

क्या पुलिस बिना वारंट गिरफ्तार कर सकती है? जानिए BNSS में आपका अधिकार! ⚖️

#कानून #कानूनीजानकारी #गिरफ्तारी

➡️SCBA चुनाव 2026: प्रदीप राय बने अध्यक्ष, प्रज्ञा बघेल सचिव और राहुल कौशिक उपाध्यक्ष, पढ़ें पूरी खबर।
19/08/2026

➡️SCBA चुनाव 2026: प्रदीप राय बने अध्यक्ष, प्रज्ञा बघेल सचिव और राहुल कौशिक उपाध्यक्ष, पढ़ें पूरी खबर।

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य की अनुकंपा आधार पर नौकरी देने की पॉलिसी में मृतक कर्मचारी के बेटे और बेटी के बीच को...
18/08/2026

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य की अनुकंपा आधार पर नौकरी देने की पॉलिसी में मृतक कर्मचारी के बेटे और बेटी के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाता है और यह सख्ती से 'पहले बच्चे' पर लागू होती है।

जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की डिवीज़न बेंच ने मृतक कर्मचारी के इकलौते बेटे की हमदर्दी के आधार पर नौकरी की मांग को खारिज करते हुए कहा: "ऊपर बताई गई क्लॉज़ (धारा) लड़कियों और लड़कों के बीच कोई भेदभाव नहीं करती या कोई अलग वर्ग नहीं बनाती; यह सख्ती से 'पहले बच्चे' का ज़िक्र करती है। ऐसा कोई भी भेदभाव भारत के संविधान के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन होगा, जो जेंडर के आधार पर भेदभाव को साफ तौर पर रोकता है।"

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NALSAR विवाद: BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने कानून के छात्रों से मांगी माफीबार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष मनन क...
16/08/2026

NALSAR विवाद: BCI अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने कानून के छात्रों से मांगी माफी

बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा ने NALSAR के छात्रों के खिलाफ जारी निर्देशों को लेकर हुई आलोचना के बाद देश के कानून छात्रों से माफी मांगी है। स्वतंत्रता दिवस पर जारी एक पत्र में मिश्रा ने कहा कि इस विवाद के संबंध में उनके किसी शब्द, बयान या पत्र से कानून के छात्रों की भावनाएं आहत हुई हों तो उन्हें इसका खेद है।

चेयरमैन मनन मिश्रा ने लिखा
“यदि मौजूदा विवाद से जुड़ी मेरी किसी बात या पत्र से हमारे कानून के छात्रों की भावनाओं को ठेस पहुंची है, तो मुझे इसका हृदय से खेद है और मैं इसके लिए माफी मांगता हूं।”

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